संस्कृति

अब पूरे विश्व में गाई जायेगी प्रभु श्री राम की गाथा

  भारतीय धर्म ग्रंथो की महत्ता और उसमें छिपे संदेश को दुनिया प्रारब्ध काल से मानती रही है । अब यूनेस्को अर्थात "  यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन " ने भी भारतीय ग्रंथों  को सम्मान प्रदान किया है । भारतवर्ष को विश्व गुरु माने जाने पर भी हमारे ग्रंथो की भूमिका ही सार्वभौम रही है । यूनेस्को ने प्रभु श्री राम के चरित्र पर आधारित महान ग्रंथ रामचरित मानस के साथ पंचतंत्र और सहृदयलोक - लोकन को विश्व स्तरीय मान्यता दिला दी है । " द मेमोरी  ऑफ वर्ल्ड इंटरनेशनल एडवाइजरी और एक्जीक्यूटिव बोर्ड " द्वारा अनुशंसित किए गए दस्तावेजों को वैश्विक महत्व और यूनिवर्सल मूल्य के आधार पर यूनेस्को की सूची में शामिल कर भारतवर्ष को विश्व गुरु माने जाने को सार्थक किया गया है । यह हर एक सनातनी को गौरवान्वित करने वाला विषय बन चुका है । भारतीय धर्म - ग्रंथों को एक - दो - चार देशों ने नहीं वरन 38 सदस्य देशों ने सम्मान प्रदान करते हुए मान्यता प्रदान की है । साथ ही 40 ऑब्जर्वर ( पर्यवेक्षक ) देशों ने भारतीय साहित्यिक रचनाओं पर ठप्पा लगाते हुए उन्हें वैश्विक पहचान दिलाने में सार्थक भूमिका का निर्वहन किया ! हमें गर्व के साथ कहना चाहिए कि हमारे तीन ग्रंथों को दिए गए सम्मान की यह उपलब्धि भारतीय संस्कृति के प्रचार और संरक्षण के लिए मील का पत्थर सिद्ध होगी ! यहां यह जानना भी जरूरी है कि आखिर हमारे इन ग्रंथों में क्या है ? यूनेस्को ने इन्हें सम्मान देना क्यों जरूरी समझा ? 

 
 भारतवर्ष के घर - घर में बांचें जाने वाली गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस को कंबोडिया , थाईलैंड , श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में सम्मान पूर्वक पढ़ा जाता है ! रामचरित मानस में समाहित सामाजिक बंधुत्व का संदेश सभी धर्मावलंबियों के लिए सुखी जन - जीवन का मार्ग प्रशस्त करता रहा है । इसी तरह पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र सदियों से पशु - पक्षियों को पात्र बनाते हुए नैतिक पाठों का संग्रह है । इसे बच्चों से लेकर उम्र - दराज लोगों द्वारा पढ़कर कहानियों में छिपे मूलभूत विचारों को आत्मसात किया जाता रहा है । इसी क्रम में सहृदयलोक- लोकन ग्रंथ अपने सौंदर्य महत्व के लिए जाना जाता है । यह ग्रंथ साहित्य के कश्मीरी विद्वान आचार्य आनंद वर्धन द्वारा रचित है । यूनेस्को मेमोरी ऑफ वर्ल्ड कार्यक्रम वैश्विक पहल हेतु जाना जाता है । इसका एक मात्र उद्देश्य दस्तावेजी विरासत को संरक्षित करना तथा अन्य लोगों तक सहज पहुंच बनाना ही है । इसे एक प्रकार से दुर्लभ ग्रंथों का संरक्षक भी कहा जाता है । आज से 32 वर्षों पूर्व इस कार्यक्रम के शुरुआत का इतिहास मिलता है । कार्यक्रम का लक्ष्य दुनिया भर में बेस्किमती अभिलेखागार और पुस्तकालय संग्रह की सुरक्षा के साथ उसका व्यापक प्रचार - प्रसार ही रहा है । 
 
 
 
हमारे धर्म - ग्रंथों रामचरित मानस , पंचतंत्र तथा सहृदयलोक - लोकन को यूनेस्को की सूची में शामिल करने का निर्णय 7 और 8 मई 2024 को लिया गया । मंगोलिया की राजधानी " उलानबटार " में आयोजित  " मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक " की यह 10 वीं आम बैठक थी , जिसमें भारतवर्ष के साहित्यिक सम्मान को गगनचुंबी ऊंचाई प्रदान की गई ! हम कह सकते है कि रामचरित मानस , पंचतंत्र और सहृदयलोक - लोकन जैसी रचनाओं ने भारतीय संस्कृति और साहित्य को जन - मानस के अंतस में उतार दिया है । हमारे लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि इन तीनों ग्रंथों ने न केवल भारतवर्ष वरन विश्व स्तर पर आम जनों के हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ा है । यूनेस्को द्वारा इन रचनाओं को मान्यता प्रदान करना भारतवर्ष की समृद्ध , सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के लिए गौरव की बात है । आने वाली पीढ़ी के लिए यह सम्मान भारतीय संस्कृति के संरक्षण की ओर स्वर्णिम कदम बढ़ाने से कम नहीं माना जाना चाहिए । रामचरित मानस भगवान श्री राम के चरित्र पर आधारित ग्रंथ है , जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में लिखा है । पंचतंत्र मूल रूप से संस्कृत भाषा की रचना है , जिसमें दंत और लोक कथाएं शामिल हैं । इस ग्रंथ को लिखकर पंडित विष्णु शर्मा ने अनेक कथाओं के माध्यम से जन - मानस के मस्तिष्क में बसी विकृत विचारधाराओं को समाप्त किया है । वहीं सहृदयलोक - लोकन को भी आचार्य आनंदवर्धन ने संस्कृत में लिखा है । 
 
 
 
  " यूनेस्को " शिक्षा , विज्ञान , संस्कृति , संचार और सूचना में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देते हुए शांति और सुरक्षा को बहाल रखने में योगदान करता आ रहा है । साथ ही मानवता के लिए उत्कृष्ट मूल्य मानी जाने वाली सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को पहचान , सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करने में महती भूमिका निभाता रहा है । यूनेस्को द्वारा भारतीय ज्ञान , परंपरा की अनुपम कृतियों को विश्व स्मृति अभिलेख के रूप में सूचीबद्ध कर यह प्रमाणित किया जा चुका है कि इन ग्रंथों की महत्ता भारतवर्ष में ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी है । हमारी सांस्कृतिक विरासत के लिए यह ऐतिहासिक अवसर है , जो हमेशा  - हमेशा के लिए सुरक्षित हो चुका है । यह हमारे लिए गर्व और उत्साह का क्षण है । इससे हमारे समृद्ध साहित्य इतिहास को नया आयाम मिला है । यूनेस्को का यह कदम भारतवर्ष की साझा मानवता को आकर देने वाली विविध कथाओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों को पहचानने और सुरक्षित रखने का संदेश देता नजर आ रहा है । 
 
 
उक्त तीनों साहित्यिक उत्कृष्ट कृतियों का सम्मान करके ,,समाज न केवल उनके रचनाकारों की रचनात्मक प्रतिभा के प्रति  कृतज्ञता ज्ञापित करता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि उसमे छिपा ज्ञान और शिक्षा भावी पीढ़ियों को प्रेरित करता रहे । हमारे देश के ऋषि - मुनियों ने सदियों तपस्या और अध्ययन के बाद जिन ग्रंथों की रचना की है ,वे सभी अपने आप में अद्वितीय हैं । हम चाहे रामायण की बात करें या फिर महाभारत और गीता के उपदेशों की , सभी ग्रंथों में मानवीय कल्याण और सदाचार की बातें की गई हैं । जितने ग्रंथ सनातन धर्म में उपलब्ध हैं , उसका कुछ ही प्रतिशत ले रूप में अन्य देश और धर्मों के ग्रंथ हमें मिलते हैं ! यह हमारे लिए अत्यंत ही रोमांचित और गौराशाली क्षण है कि हमारे ग्रंथों ने अपनी व्यवहारिकता को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने  शीर्षस्थ संस्था को विचार करने विवश किया । अब हम पूरे उत्साह के साथ यह कहने की स्थिति में हैं कि भारतवर्ष विश्व गुरु था ,है और आगे भी रहेगा । 
 

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