<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>संस्कृति - Didi News Feed</title><link>https://didinews.co.in/</link><description>Didi News Feed Description</description><item><title>खाटू श्याम भक्तों की आस्था का प्रतीक है निशान यात्रा, जानिए क्या है इसकी परंपरा और आध्यात्मिक महत्व </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8354</link><description>राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर से लेकर देशभर के खाटू श्याम मंदिरों में भक्त हर एकादशी तिथि पर निशान ध्वज लेकर लंबी यात्रा करते हुए पहुंचते हैं. श्याम भक्तों के बीच यह परंपरा बेहद श्रद्धा और आस्था से जुड़ी मानी जाती है.




हिंदू धर्म में ध्वज को विजय का प्रतीक माना गया है. खाटू श्याम जी को निशान (ध्वज) अर्पित करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है. आज भी बाबा श्याम को निशान चढ़ाया जाता है. निशान को झंडा और ध्वज भी कहा जाता है. इसे बाबा श्याम द्वारा दिए गए बलिदान और दान का प्रतीक माना जाता है.


पौराणिक कथा
मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर धर्म की जीत के लिए खाटू श्याम ने अपना शीश समर्पित कर दिया था और युद्ध की विजय का श्रेय भगवान श्रीकृष्ण को दिया था. इसी कारण से निशान को उनके बलिदान और समर्पण का प्रतीक माना जाता है.


निशान अर्पित करने का नियम
बाबा श्याम को जो निशान अर्पित किया जाता है, वह मुख्य रूप से केसरिया, नारंगी और लाल रंग का होता है. इन ध्वजों पर भगवान श्रीकृष्ण और बाबा श्याम की तस्वीरें तथा मोर पंख लगाए जाते हैं. मान्यता है कि इस निशान को बाबा श्याम को अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर भी निशान चढ़ाते हैं. निशान को खाटू श्याम बाबा के बलिदान और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है और इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व बताया गया है.</description><guid>8354</guid><pubDate>07-Mar-2026 10:14:17 am</pubDate></item><item><title>Kharmas 2026 : एक माह तक मांगलिक कार्यों पर लगने वाला है ब्रेक </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8353</link><description>Kharmas 2026 : खरमास जिसे अधिकमास भी कहा जाता है. बस कुछ ही दिनों बाद शुरू होने वाला है. खरमास की अवधि के दौरान शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते. ज्योतिष गणना के अनुसार जब सूर्य देव धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब उस समय को खरमास कहा जाता है. वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष सूर्य 14 मार्च को मीन राशि में गोचर करेंगे. इसके साथ ही साल के दूसरे खरमास की शुरुआत हो जाएगी. पहला खरमास 16 दिसंबर से 14 जनवरी तक रहा था. हिंदू कैलेंडर के अनुसार खरमास का प्रारंभ चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि से लेकर वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि तक माना गया है.




पवित्र नदी में स्नान अत्यंत शुभ
धार्मिक मान्यता के अनुसार खरमास के दौरान पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इस अवधि में स्नान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है. इस दौरान नदी में दीपदान करना भी शुभ फलदायी माना गया है.


मांगलिक कार्य वर्जित
खरमास में कई मांगलिक कार्यों को वर्जित माना जाता है. इस दौरान विवाह करना शुभ नहीं माना जाता. मान्यता है कि इस समय विवाह करने से दांपत्य जीवन में परेशानियां और भावनात्मक दूरी आ सकती है. इसके अलावा गृह प्रवेश या नया घर बनवाने जैसे कार्य भी नहीं किए जाते.


नए कार्य की शुरुआत भी ना करें
खरमास में नए काम की शुरुआत करने से भी बचने की सलाह दी जाती है. मान्यता के अनुसार इससे आर्थिक हानि और कार्यों में सफलता नहीं मिलती. इसी तरह मुंडन संस्कार और नामकरण जैसे मांगलिक कार्य भी इस अवधि में नहीं किए जाते. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस समय बड़े कार्यों की शुरुआत करने के बजाय संयम, साधना, जप-तप और आत्मचिंतन पर ध्यान देना उचित माना जाता है.</description><guid>8353</guid><pubDate>07-Mar-2026 10:12:41 am</pubDate></item><item><title>40 दिनों के लिए अस्त्र होंगे शनि, इन राशियों को मिलेगी राहत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8352</link><description>13 मार्च को शनि देव अस्त होने जा रहे हैं. जिसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ेगा. ज्योतिष के अनुसार शनि के अस्त होने से कुछ राशियों को राहत और सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं. द्रिक पंचांग के मुताबिक, शुक्रवार 13 मार्च को शाम 7 : 13 मिनट पर शनि मीन राशि में अस्त होंगे. इसके बाद लगभग 40 दिनों तक अस्त रहने के बाद बुधवार 22 अप्रैल 2026 को सुबह 4: 49 मिनट पर दोबारा उदित होंगे. मान्यता है कि जब शनि अस्त होते हैं तो उनके कठोर प्रभाव कुछ हद तक कम हो जाते हैं.




शनि दोष से पीड़ितों को राहत
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार 13 मार्च को शनि सूर्य के काफी करीब आ जाएंगे. जिसके कारण उनकी शक्तियां कम हो जाएंगी. ऐसे में कुछ लोगों के लिए यह समय राहत देने वाला हो सकता है, जबकि कुछ को सतर्क रहने की जरूरत होगी. खासतौर पर जिन लोगों पर साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव चल रहा है, उन्हें इस दौरान कुछ राहत मिलने की संभावना मानी जाती है.


राशियों पर असर
कुंभ राशि पर चल रही साढ़ेसाती के अंतिम चरण में शनि के अस्त होने से मानसिक तनाव कम हो सकता है और रुका हुआ धन मिलने के संकेत मिलते हैं. मीन राशि में ही शनि अस्त होने के कारण साढ़ेसाती के प्रभाव में कुछ कमी आने की बात कही जाती है, जिससे आत्मबल और सेहत में सुधार के योग बनते हैं. धनु राशि पर चल रही शनि की ढैय्या के दौरान भौतिक सुख-सुविधाओं और नई नौकरी के अवसर मिल सकते हैं. वहीं सिंह राशि वालों को करियर में आ रही बाधाओं से राहत और व्यापार में लाभ के संकेत बताए जाते हैं.


शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय
शनि देव को प्रसन्न करने के लिए कुछ सरल उपाय भी बताए गए हैं. छाया दान के लिए सरसों के तेल में अपना चेहरा देखकर उसे दान करना शुभ माना जाता है. इसके साथ ही प्रतिदिन ओम शं शनैश्चराय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना लाभकारी बताया गया है. शनिवार की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है. साथ ही जरूरतमंद लोगों की मदद करना और कर्मों में ईमानदारी रखना शनि की कृपा पाने का महत्वपूर्ण उपाय माना गया है.</description><guid>8352</guid><pubDate>07-Mar-2026 10:10:39 am</pubDate></item><item><title>शुक्रवार को रखा जाएगा भालचंद्र संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत, यह होगा चंद्र दर्शन का समय</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8344</link><description>शुक्रवार को भालचंद्र संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन कई महत्वपूर्ण योग और नक्षत्र बन रहे हैं। जिनका संबंध पूजा-पाठ और व्रत से जुड़ी मान्यताओं से माना जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की पूजा करते हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं।


पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, 6 मार्च को पूरे दिन और पूरी रात के बाद अगले दिन सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक वृद्धि योग रहेगा। शुक्रवार सुबह 9 बजकर 30 मिनट तक हस्त नक्षत्र रहेगा, इसके बाद चित्रा नक्षत्र लग जाएगा। तिथि की बात करें तो 6 मार्च को शाम 5 बजकर 53 मिनट तक तृतीया तिथि रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि शुरू होगी।


दृक पंचांग के अनुसार, चैत्र कृष्ण चतुर्थी तिथि की शुरुआत 6 मार्च, शुक्रवार को शाम 5 बजकर 53 मिनट से होगी और इसका समापन 7 मार्च, शनिवार को शाम 7 बजकर 17 मिनट पर होगा। संकष्टी चतुर्थी व्रत में यह नियम है कि चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान होनी चाहिए, क्योंकि व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है।


चंद्र दर्शन का समय
6 मार्च की रात चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि रहेगी, इसलिए व्रत 6 मार्च को ही रखा जाएगा। संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा रहती है, क्योंकि इसी के बाद व्रत का पारण किया जाता है। 6 मार्च को चंद्रोदय रात 9 बजकर 14 मिनट होगा। कुछ पंचांगों के अनुसार चांद लगभग 9 बजकर 31 मिनट पर दिखाई देना शुरू हो सकता है।


पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी को संकटों को हरने वाली चतुर्थी कहा गया है। इस दिन गणेश जी को दूर्वा चढ़ाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से स्वास्थ्य लाभ और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।</description><guid>8344</guid><pubDate>06-Mar-2026 10:14:37 am</pubDate></item><item><title>होली के बाद शुरू होगी गणगौर की अनोखी परंपरा, जानें पूरी रस्म और महत्व</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8340</link><description>गणगौर का पर्व विशेष महत्व रखता है। यह पर्व पूरे 16 दिन तक मनाया जाता है, जिसमें कुंवारी लड़कियां, नवविवाहिता और महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की ईसर और गणगौर के रूप में पूजा करती हैं। प्रतिदिन नवविवाहिताएं और युवतियां एकत्रित होकर कुओं से दूब लेकर आती हैं, उसी से गणगौर का पूजन करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत रखने वाली महिलाओं को शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।


4 मार्च से होगी पूजा शुरू
परंपरा में गणगौर सुहाग, श्रद्धा और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। 4 मार्च से ईसर-गणगौर पूजन का शुभारंभ होगा। महिलाएं भाग्य और सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं।


16 दिनों तक रखा जाएगा व्रत
गणगौर पर्व की विशेषता 16 दिवसीय साधना और सोलह श्रृंगार में है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 16 दिनों तक तपस्या की थी। इसी कारण यह पर्व 16 दिनों तक मनाया जाता है। पूजा में 16 प्रकार की सामग्री, 16 बार काजल, रोली या मेहंदी से बिंदियां, 16 व्यंजनों का भोग और सोलह श्रृंगार किया जाता है।


परंपरा का हिस्सा
होली के दूसरे दिन से 8 दिन कच्ची और फिर 8 दिन पक्की गणगौर की पूजा होती है। शीतलाष्टमी पर कुम्हार के घर से मिट्टी लाकर गणगौर और ईसर की मूर्ति बनाई जाती है, और उनका श्रृंगार किया जाता है। यह पर्व राजस्थान की संस्कृति को दर्शाता है। इस पर्व को देशभर में राजस्थानी समाज के लोग मानते हैं।</description><guid>8340</guid><pubDate>04-Mar-2026 11:30:40 am</pubDate></item><item><title>सफेद कपड़े पहनकर क्यों खेली जाती है होली? जानिए वजह</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8339</link><description>रायपुर। 4 मार्च को देशभर में होली का पर्व मनाया जाएगा। घरों में तैयारियां चल रही हैं। बाजारों में रौनक बढ़ गई है। हर साल की तरह इस बार भी अधिकतर लोग सफेद कपड़ों में होली खेलते नजर आएंगे। इसे केवल फैशन नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता से जोड़कर देखा जाता है।




धार्मिक मान्यता के अनुसार सफेद रंग शुद्धता, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। होलिका दहन बुराई के अंत और नई शुरुआत का संकेत देता है। होली पर सफेद कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे मन शांत रहता है। नकारात्मक विचार दूर होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों को शीघ्र क्रोध आता है या जिनका मन अशांत रहता है। उन्हें होली पर सफेद कपड़े पहनने चाहिए। सफेद रंग का संबंध चंद्रमा और शुक्र से माना गया है। जिससे ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और जीवन में शुभता आती है।


सफेद रंग को कोरे कैनवास की तरह भी देखा जाता है। जब इस पर गुलाल और अन्य रंग पड़ते हैं, तो वे अधिक स्पष्ट और सुंदर दिखाई देते हैं। यह आपसी भेदभाव मिटाकर प्रेम और भाईचारे के रंग में रंगने का प्रतीक है। रंगों के बाद सभी एक समान नजर आते हैं। जिससे समानता और सौहार्द का संदेश मिलता है। वैज्ञानिक रूप से भी सफेद रंग सूर्य की किरणों को परावर्तित करता है। जिससे शरीर का तापमान संतुलित रहता है। इस प्रकार होली पर सफेद कपड़े पहनना धार्मिक आस्था, शांति और सकारात्मकता से जुड़ा माना जाता है।</description><guid>8339</guid><pubDate>04-Mar-2026 11:29:08 am</pubDate></item><item><title>भद्रा और चंद्र ग्रहण के बीच कब करें होलिका दहन? जानें शुभ मुहूर्त</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8335</link><description>फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का दिव्य प्रतीक है। इस दिन संध्या समय विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है और भक्तजन अपने जीवन से नकारात्मकता, पाप और अहंकार को दूर करने का संकल्प लेते हैं।


होलिका दहन 2026 कब है?
इस वर्ष होली पर्व पर भद्रा एवं खग्रास चंद्र ग्रहण का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे होलिका दहन को लेकर दुविधा उत्पन्न हो गई है। ऐसे में पंडितों के मत के अनुसार 3 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा और अगले दिन 4 मार्च को धुलेंडी पर रंगों का त्योहार मनाया जाएगा।


इस बार होली के दिन पड़ने वाला चंद्र ग्रहण खण्डग्रास होगा। यह ग्रहण भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी देखा जा सकेगा। पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 55 मिनट पर होगी। इसका समापन अगले दिन 3 मार्च को शाम 5 बजकर 7 मिनट पर होगा। अगर द्रिक पंचांग की बात करें तो पंचांग के अनुसार होलिका दहन 3 मार्च को किया जाना है। जिसका शुभ मुहूर्त शाम 6:41 बजे से शाम 9:07 बजे तक रहेगा। वहीं एस्ट्रोसेज के पंचांग के अनुसार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 3 मार्च को शाम 6:22 बजे से 08:50 बजे के मध्य उचित रहेगा।


पौराणिक कथा
होलिका दहन की कथा का वर्णन श्रीमद् भागवत और अन्य पुराणों में मिलता है। हिरण्यकशिपु नामक अत्याचारी असुरराज ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था। उसका पुत्र भक्त प्रह्लाद भगवान श्रीहरि विष्णु का परम भक्त था। यह बात हिरण्यकशिपु को स्वीकार नहीं थी। उसने कई बार प्रह्लाद को मृत्यु के मुख में धकेलने का प्रयास किया, किंतु हर बार भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे।


अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था) से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने को कहा। लेकिन भगवान के कृपा आगे होलिका को प्राप्त वरदान निष्फल हो गया। होलिका अग्नि में भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए। यही घटना होलिका दहन के रूप में आज भी मनाई जाती है।


होलिका दहन का धार्मिक महत्व
होलिका दहन को पापों के दहन और नव जीवन के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि हमारे भीतर जो भी नकारात्मक भाव जैसे क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, अहंकार आदि हैं, उन्हें इस अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। अग्नि देवता को साक्षी मानकर जब हम होलिका की परिक्रमा करते हैं, तो यह हमारे आत्मशुद्धि का संकल्प होता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोग सूखी लकड़ियाँ और उपले अग्नि में अर्पित करते हैं। जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि की प्रार्थना का प्रतीक है।


पूजन विधि
होलिका दहन स्थल को शुद्ध करके वहाँ लकड़ियों या उपलों का ढेर सजायें। रोली, अक्षत, पुष्प, जल, गुड़, हल्दी, मूंग, गेहूं की बालियाँ आदि से पूजन करें। कच्चा सूत (मौली) होलिका के चारों ओर लपेटे। भक्तजन श्रद्धा से परिक्रमा करते हुए सुख-समृद्धि और संतानों की रक्षा हेतु कामना करें। होलिका की अग्नि की राख को माथे पर लगाएं। इससे नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।


सांस्कृतिक महत्व
होलिका दहन धार्मिक त्यौहार के साथ ही सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस दिन लोग अपने मतभेद भुलाकर एक साथ एकत्रित होते हैं। गाँवों और मोहल्लों में सामूहिक रूप से होलिका दहन किया जाता है, जिससे भाईचारा और एकता की भावना प्रबल होती है। यह पर्व हमें बताता है कि अहंकार का अंत निश्चित है। हिरण्यकशिपु का अभिमान नष्ट हुआ और अंततः भगवान श्रीनृसिंह ने उसका वध कर धर्म की स्थापना की। होलिका दहन हमें सदैव विनम्रता, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।


होलिका दहन की ज्वाला केवल बाहर की लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान को भी भस्म करने का संकेत देती है। यदि हम इस पर्व को आत्ममंथन का अवसर समझें, तो इसका वास्तविक लाभ प्राप्त होगा।


होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक दिव्य उत्सव है, जो हमें यह संदेश देता है कि धर्म की विजय निश्चित है और ईश्वर अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, सकारात्मकता और समाज में प्रेम-एकता स्थापित करने का संदेश देता है। आइए, इस फाल्गुन पूर्णिमा पर हम भी अपने जीवन की नकारात्मकताओं को होलिका की अग्नि में समर्पित करें और प्रह्लाद की भक्ति को हृदय में स्थान दें।


</description><guid>8335</guid><pubDate>02-Mar-2026 11:08:47 am</pubDate></item><item><title>चंद्र ग्रहण के बाद ऐसे करें घर और मंदिर का शुद्धिकरण </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8331</link><description>फाल्गुन पूर्णिमा के दिन 3 मार्च को साल का पहला और सबसे लंबा चंद्र ग्रहण लगेगा. सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण को अशुभ माना गया है. इसकी अवधि 3 घंटे 27 मिनट रहेगी. यह दोपहर 3:20 बजे से 6:47 बजे तक रहेगा. सूतक काल 9 घंटे पहले सुबह 6:20 बजे से शुरू होगा. इस दौरान मूर्ति स्पर्श, पूजा-पाठ और भोजन बनाने या खाने की मनाही रहती है.




मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. ग्रहण समाप्त होने के बाद घर और मंदिर का शुद्धिकरण किया जाता है. सबसे पहले घर की सफाई करें और सभी सदस्य स्नान करें. ग्रहण के बाद दान-पुण्य का महत्व माना गया है. अन्न, वस्त्र या धन का दान किया जाता है. जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है और स्नान के बाद भगवान के दर्शन कर पूजा की जाती है.


ग्रहण के बाद घर शुद्ध करने की विधि
पूरे घर को नमक मिले पानी से धोएं.
इसके बाद गंगाजल का छिड़काव करें.
घर में गौमूत्र का छिड़काव करें.
हवन या धूप-दीप जलाएं.
वातावरण शुद्ध करें.


ग्रहण के बाद मंदिर शुद्ध करने की विधि
पहले मंदिर की अच्छी तरह सफाई करें.
साफ पानी से पोछा लगाएं.
प्रतिमाओं के वस्त्र हटाकर साफ करें.
गंगाजल छिड़ककर स्नान कराएं.
पुनः स्थापना कर फूल, वस्त्र और भोग अर्पित करें.</description><guid>8331</guid><pubDate>01-Mar-2026 10:24:28 am</pubDate></item><item><title>काले वस्त्र क्यों धारण करते हैं शनिदेव और यमराज, जानिए भक्तों को कब पहनने चाहिए काले कपड़े </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8325</link><description>शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए काला कपड़ा, काला तिल, काले चने, काली उड़द या लोहे का समान चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि शनिदेव को काली वस्तुएं ही पसंद हैं. इसलिए उनकी पूजा में विशेषतौर पर काली वस्तुओं का ही प्रयोग होता है. शनिवार शनिदेव का प्रिय दिन है. विद्वानों का मानना ​​है कि शनिवार को काला रंग पहनने से उनकी कृपा प्राप्त होती है. शनि की कृपा से जीवन की कठिनाइयां दूर होती हैं. अब लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि शनिदेव और यमराज काले कपड़े ही क्यों पहननते हैं?




शनिदेव और यमराज दोनों सूर्यदेव के पुत्र हैं. दोनों ही काले वस्त्र धारण करते हैं. इन दोनों देवताओं को न्याय का दायित्व सौंपा है. जीवित प्राणियों को उनके कर्मों का फल शनिदेव देते हैं, जबकि मृत्यु के बाद कर्मों का निर्णय यमराज करते हैं. माना जाता है कि न्याय के इस कठोर दायित्व के कारण ही दोनों देव काले वस्त्र पहनते हैं. यदि वे क्रूर और कठोर स्वरूप में न हों तो न्याय संभव नहीं हो पाएगा, क्योंकि जैसे कर्म होते हैं, वैसा ही फल देना उनका कर्तव्य है. काले वस्त्रों को न्याय का प्रतीक भी माना गया है. पृथ्वी पर न्यायाधीश और वकील भी काले कपड़े पहनकर न्याय करते हैं. मान्यता है कि काला रंग निष्पक्षता और कठोरता का प्रतीक है. एक कारण यह भी बताया जाता है कि काले रंग पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता.


पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्यदेव की पत्नी संध्या उनके तेज को सहन नहीं कर पाईं और अपनी छाया को उनके पास छोड़कर चली गईं. छाया से ही शनिदेव का जन्म हुआ. जन्म के समय वे अत्यंत काले और दुर्बल थे. काला पुत्र देखकर सूर्यदेव ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. जिससे शनिदेव को ठेस पहुंची. शनिवार के दिन काले वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है.
</description><guid>8325</guid><pubDate>28-Feb-2026 10:48:37 am</pubDate></item><item><title>रंग उत्सव को लेकर कन्फ्यूजन खत्म, जानें होलिका दहन, भद्रा और चंद्र ग्रहण की सही तिथियां </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8323</link><description>होलिका दहन की तिथि को लेकर बनी भ्रम की स्थिति अब स्पष्ट हो गई है. हिंदू परंपरा में होली से पहले पूर्णिमा तिथि पर होलिका दहन किया जाता है. जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन भद्रा मुख में नहीं किया जाता है. इसलिए भद्रा काल का ध्यान रखना आवश्यक है.




भद्रा काल का समय
भद्रा काल 2 मार्च 2026 को शाम 5:58 बजे से शुरू होकर 3 मार्च 2026 को सुबह 5:30 मिनट तक रहेगा. 2 मार्च 2026 को भद्रा मुख रात्रि 2:38 मिनट से सुबह 4:34 मिनट तक रहेगा. पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को शाम 5:27 मिनट तक है, लेकिन इस दिन चंद्र ग्रहण भी लग रहा है. इसलिए सलाह है कि होलिका दहन 2 मार्च को भद्रा काल से पहले शुभ मुहूर्त में किया जाए.


चंद्र ग्रहण का समय सूतक काल
3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से शाम 6:47 मिनट तक चंद्र ग्रहण रहेगा. चंद्र ग्रहण का सूतक 9 घंटे पहले, यानी सुबह 6:23 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा. सूतक काल में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे और पूजा-पाठ नहीं होगा.


रंग उत्सव का दिन
रंगों वाली होली इस बार 4 मार्च, बुधवार को रंगोत्सव के रूप में मनाई जाएगी. इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग, गुलाल लगाकर भाईचारे और प्रेम का संदेश देंगे. यह पर्व भक्त प्रह्लाद की विजय और होलिका के अंत की स्मृति में मनाया जाता है.</description><guid>8323</guid><pubDate>28-Feb-2026 10:42:26 am</pubDate></item><item><title>एकादशी कौन थी? क्यों एकादशी भगवान विष्णु को प्रिय हैं</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8321</link><description>साल में 24 एकादशी होते हैं। हर महीने दो एकादशी व्रत रखे जाते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु को तुलसी दल, कार्तिक महीना और एकादशी व्रत अत्यंत प्रिय हैं। जो भक्त तुलसी अर्पित करता है, एकादशी का व्रत रखता है। कार्तिक माह में भगवान विष्णु की आराधना करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। स्कंदपुराण में एकादशी माता की उत्पत्ति और सभी एकादशियों का महात्म्य वर्णित है।




एकादशी माता से जुड़ी कथा
इंद्र सहित देवताओं ने भगवान श्री हरि विष्णु से प्रार्थना की कि मुर नामक दैत्य ने उन्हें पराजित कर स्वर्ग से निकाल दिया है। वे उनकी शरण में आए हैं। इंद्र ने बताया कि तालजडू नामक असुर के वंश में उत्पन्न मुर दानव चन्द्रावती नगरी में रहता है और उसने देवताओं को परास्त कर दिया है। भगवान विष्णु देवताओं के साथ वहां पहुंचे। दानवों का संहार किया और बाद में सिंहावती गुफा में विश्राम करने लगे, जहां मुर उन्हें मारने पहुंचा। उसी समय भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। उसने मुर दानव से युद्ध कर उसे भस्म कर दिया।


भगवान के जागने पर कन्या ने बताया कि उनके प्रसाद से उसने दैत्य का वध किया है। प्रसन्न होकर भगवान ने वर मांगने को कहा। वह कन्या साक्षात एकादशी थीं। उन्होंने वर मांगा कि जो भक्त उनके दिन उपवास करें, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो और भगवान उन्हें धन, धर्म और मोक्ष प्रदान करें।</description><guid>8321</guid><pubDate>27-Feb-2026 11:31:35 am</pubDate></item><item><title>Pradosh Vrat 2026 : मार्च माह में महादेव का अभिषेक करने के लिए मिलेंगे तीन विशेष अवसर </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8320</link><description>Pradosh Vrat 2026 : शिव भक्तों को मार्च महीने में तीन बार महादेव की विशेष आराधना का मौके मिलने वाले हैं. भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार आता है. दोनों व्रत कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर आती है. मान्यता है कि प्रदोष व्रत में जिन लोगों ने पूरे विधि-विधान से महादेव के साथ-साथ मां पार्वती की पूजा कर ली तो उसकी जिंदगी की सारी बाधाएं पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं. साथ ही घर मैं खुशहाली और बरकत आती है.




मार्च के महीने में पड़ने वाले प्रदोष व्रत
पहला प्रदोष व्रत
मार्च का पहला प्रदोष व्रत महीने की शुरुआत में ही 28 तारीख को पड़ेगा. इस दिन रविवार पड़ेगा. जिससे रवि प्रदोष व्रत कहा जाएगा. इस व्रत की खासियत ही यही है. फरवरी के आखिरी दिन ही त्रयोदिशी तिथि का आरंभ होगा. ये 8:43 बजे से शुरू होकर अगले दिन यानी 1 मार्च को रात में 9:11 बजे तक रहेगा. मार्च में पड़ने वाले प्रदोष व्रत की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम को 6:21 बजे से 7:08 बजे तक रहेगा. जिसमें अभिषेक किया जा सकता है.


दूसरा प्रदोष व्रत
दूसरा प्रदोष व्रत 16 मार्च को पड़ेगा. इस दिन सोमवार होने से सोम प्रदोष व्रत रहेगा. इसमें त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 16 मार्च की सुबह 9.41 बजे से लेकर अगले दिन यानी 17 मार्च की सुबह 9.24 बजे तक रहेगी. पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम को 6.31 बजे से लेकर 8.54 मिनट तक रहेगा.


तीसरा प्रदोष व्रत
तीसरा प्रदोष व्रत 30 मार्च को पड़ेगा मार्च के आखिरी हफ्ते में पढ़ने वाला यह व्रत भी सोमवार के दिन ही पढ़ने वाला है जिसे सोम प्रदोष व्रत कहलाएगा. त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 30 मार्च की सुबह 7:08 बजे से लेकर अगले दिन 31 मार्च की सुबह 6:56 मिनट तक रहने वाली है. शुभ मुहूर्त शाम को 6:38 बजे से 8:57 मिनट तक रहेगा.


प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत की पूजा विधि काफी आसान है. जिस तरह महादेव के अन्य व्रत की पूजा में किया जाती है, इस व्रत में एक विशेष समय होता है, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है. वह समय जब सूर्यास्त से 1 घंटे पहले और सूर्यास्त के 1 घंटे बाद का काल कहलाता है. इस समय भगवान महादेव का अभिषेक करना विशेष फलदाई होता है.</description><guid>8320</guid><pubDate>27-Feb-2026 11:28:53 am</pubDate></item><item><title>जल्द बनने वाला है महालक्ष्मी राजयोग, इन राशियों को करेगा माला-माल </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8319</link><description>वैदिक ज्योतिष में नव ग्रहों की चाल का जीवन पर प्रभाव पड़ता है. ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं. इस राशि परिवर्तन से शुभ और अशुभ योग बनते हैं. मंगल और चंद्रमा का मेल महालक्ष्मी राजयोग बनाता है. जब मंगल चंद्रमा को देखता है या दोनों केंद्र या त्रिकोण में होते हैं या दोनों एक साथ किसी भाव में आते हैं. तब महालक्ष्मी राजयोग बनता है. पंचांग के अनुसार 16 मार्च 2026 को मंगल और चंद्रमा एक शक्तिशाली महालक्ष्मी राजयोग बनाने जा रहे हैं. सहास, ऊर्जा के कारक मंगल 23 फरवरी 2026 से कुंभ राशि में प्रवेश कर चुके हैं. मंगल 22 अप्रैल तक इसी राशि में रहेंगे. 16 मार्च 2026 को शाम 6 बजकर 13 मिनट बजे मन के कारक चंद्रमा भी कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे.




यह स्थिति 16 मार्च 2026 से ढाई दिन तक रहेगी. मंगल और चंद्रमा के मिलन से महालक्ष्मी राजयोग सक्रिय होगा. महालक्ष्मी राजयोग को महाभाग्य योग भी कहते हैं. यह योग बहुत शुभ माना जाता है. इस दौरान अचानक धन और कम मेहनत में बड़ी सफलता मिलती है. धन लाभ के अवसर बनते हैं. देवी लक्ष्मी की कृपा रहती है. इस योग से इन राशियों को विशेष लाभ होने वाला है.


वृषभ राशि
यह राजयोग लाभदायक रहेगा. कार्यक्षेत्र में उन्नति होगी. नया कारोबार शुरू कर सकते हैं. परिवार में सुख शांति रहेगी. धन में वृद्धि के संकेत हैं. विदेश से जुड़े काम सफल होंगे. बेरोजगारों को नौकरी मिल सकती है.


मकर राशि
महालक्ष्मी राजयोग धन भाव में बनेगा. रुका हुआ पैसा मिल सकता है. अटके कार्य पूरे होंगे. कारोबार में नई डील होने की संभावना बन रही है. नए ग्राहक जुड़ सकते हैं. इस अवधि में निवेश से लाभ संभव है.


मिथुन राशि
यह योग शुभ फल देगा. व्यापार में बढ़ोतरी होगी. साझेदारी से लाभ मिलेगा. आय के नए स्रोत बनेंगे. नौकरी बदलने का अवसर मिलेगा. आर्थिक योजना सफल होगी. इस दौरान भाग्य पूरा-पूरा साथ मिलेगा.</description><guid>8319</guid><pubDate>27-Feb-2026 11:25:13 am</pubDate></item><item><title>Holashtak 2026 : होलाष्टक के इन आठ दिनों में कौन-कौन से ग्रह कब रहेंगे उग्र, क्या रखनी होगी सावधानी</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8317</link><description>Holashtak 2026 : शास्त्रों में होलाष्टक के आठ दिनों को अशुभ माना गया है. मान्यता है कि इन आठ दिनों में नवग्रह उग्र स्थिति होते है. अष्टमी से पूर्णिमा तक अलग-अलग दिनों में अलग-अलग ग्रह उग्र होते हैं. वर्तमान ग्रह गोचर की बात करें तो होलाष्टक के 8 दिनों में मिथुन, सिंह, कुंभ, कर्क और मीन राशियों पर उग्र ग्रहों की सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिलेगा.




होलाष्टक पहला दिन
ज्योतिष मान्यताओं के मुताबिक, होलाष्टक के पहले दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को चंद्रमा उग्र रहता है.


होलाष्टक दूसरा दिन
ज्योतिष मान्यताओं की मानें तो होलाष्टक के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल नवमी को सूर्य देव उग्र रहते हैं.


होलाष्टक तीसरा दिन
होलाष्टक का तीसरा दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि होती है. ज्योतिष मान्यताओं के मुताबिक, तीसरे दिन कर्मफलदाता शनि देव उग्र रहते हैं.


होलाष्टक चौथा दिन
बता दें कि होलाष्टक के चौथे दिन आंवला एकादशी या रंभगरी एकादशी होती है. ज्योतिष मान्यताओं की मानें तो फाल्गुन शुक्ल एकादशी को शुक्र ग्रह उग्र रहते हैं.


होलाष्टक पांचवा दिन
ज्योतिष मान्यताओं के मुताबिक, होलाष्टक के पांचवे दिन फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को गुरु ग्रह उग्र रहते हैं.


होलाष्टक छठा दिन


होलाष्टक का छठा दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को होता है. बता दें कि इस दिन प्रदोष व्रत रखते हैं. माना जाता है कि इस दिन बुध ग्रह उग्र रहते हैं.


होलाष्टक सातवां दिन
कहते हैं कि होलाष्टक के सातवें दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मंगल ग्रह उग्र होते है.


होलाष्टक आठवां दिन
ज्योतिष मान्यताओं के मुताबिक, होलाष्टक के आठवें दिन फाल्गुन पूर्णिमा यानी होलिका दहन को राहु ग्रह उग्र होता है.</description><guid>8317</guid><pubDate>26-Feb-2026 10:44:56 am</pubDate></item><item><title>Amalaki Ekadashi : इस तारीख को रखा जाएगा आमलकी एकादशी का व्रत, यह होगा पूजा का सही समय </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8316</link><description>Amalaki Ekadashi : सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत विशेष स्थान दिया जाता है साल में 24 एकादशी आती है प्रत्येक एकादशी अपने भीतर एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा समेटे होती है, परंतु आमलकी एकादशी सभी एकादशियों में विशेष फलदाई मानी गई है. यह पवन तिथि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आती है और शास्त्रों में इसे पापों का नाश करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी कहा गया है. इस एकादशी का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि आमलकी एकादशी पर आंवला के पेड़ और उसके फल की पूजा का महत्व है.




हिंदू धर्म के अनुसार आंवला के पेड़ में भगवान विष्णु का वास होता है, पौराणिक मंत्र के अनुसार इस पवित्र पेड़ को भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी के साथ ही प्रकट किया था. मान्यता है की आमलकी एकादशी वाले दिन जो कोई व्यक्ति भगवान विष्णु के साथ इस पेड़ की पूजा करता है. वह श्री हरि की कृपा से सभी सुखों को भोक्ता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है.


आमलकी एकादशी के व्रत और पूजा का शुभ समय
पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 27 फरवरी को रात 12:30 बजे से होगा और यह तिथि उसी दिन रात 10:32 बजे तक रहेगी. इस साल 2026 में आमलकी एकादशी का व्रत 27 फरवरी शुक्रवार को रखा जाएगा. साथ ही इस दिन आंवला के पेड़ की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शुभ है 6:48 बजे से 11:08 बजे तक का रहेगा. व्रत का परायण अगले दिन 28 फरवरी सुबह 6:42 बजे से 9:06 बजे के बीच होगा. इस दिन आंवला के पेड़ की पूजा के साथ तुलसी जी की पूजा कोई करनी चाहिए.


आमलकी एकादशी पर शुभ योग
27 फरवरी को एकादशी तिथि के साथ कई शुभ योग भी बना रहे हैं. जिसमें सर्व सिद्धि योग, रवि योग, आयुष्मान योग और सौभाग्य योग जैसे मंगलकारी योग का फल भक्तों को मिलेगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार इन शुभ योग में की गई पूजा पाठ, व्रत और दान कई गुना अधिक फल प्रदान करता है.</description><guid>8316</guid><pubDate>26-Feb-2026 10:42:43 am</pubDate></item><item><title>Holi 2026 : होलिका दहन के एक दिन बाद खेला जाएगा रंग-गुलाल </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8315</link><description>Holi 2026 : होली की तारीख को लेकर इस बार लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है. कोई 3 मार्च को रंग खेलने की बात कर रहा है तो कोई 4 मार्च 2026 को. पंचांग के विशेष संयोगों के कारण इस वर्ष त्योहार की तिथियों में बदलाव की स्थिति बनी है. फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च 2026 को है. इसी दिन होलिका दहन किया जाएगा. इसके बाद 3 मार्च को चंद्र ग्रहण और सूतक काल के कारण रंगों की होली नहीं खेलने की सलाह दी गई है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शुभ संयोग 4 मार्च 2026 को बन रहे हैं, इसलिए रंग-गुलाल उसी दिन उड़ेंगे.




हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है. जिसे छोटी होली भी कहा जाता है. यह आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है. इसका संदेश असत्य और अहंकार के अंत और सत्य की विजय से जुड़ा है. 2 मार्च 2026 की शाम 5:32 बजे पूर्णिमा तिथि शुरू होगी. इस दिन भद्रा शाम 5:18 बजे से 3 मार्च सुबह 4:56 बजे तक रहेगी.


शास्त्रों में भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं, हालांकि भद्रा के पुच्छ भाग में होलिका दहन किया जा सकता है. इस वर्ष होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात 12:50 बजे से 2:02 बजे तक रहेगा. जो 1 घंटा 12 मिनट का श्रेष्ठ समय माना गया है. 3 मार्च 2026 की शाम खग्रास चंद्र ग्रहण लगेगा. ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा और सुबह करीब 6:30 बजे से सूतक प्रभावी रहेगा. सूतक काल में शुभ और मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ तथा खान-पान वर्जित माने जाते हैं, इसलिए इस दिन रंग खेलने की मनाही की जा रही है.


ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 4 मार्च 2026 को पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का संयोग रहेगा. सुबह 7:27 बजे तक पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और उसके बाद पूरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र प्रभावी रहेगा. साथ ही धृति योग का शुभ संयोग भी रहेगा. इस दिन रंगों की होली मनाना मंगलकारी माना गया है और अबीर-गुलाल से प्रेम व सौहार्द का संदेश दिया जाएगा.</description><guid>8315</guid><pubDate>26-Feb-2026 10:40:04 am</pubDate></item><item><title>होली तक गर्भवती महिलाओं और बच्चों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत, इस समय एक्टिव होती है नेगेटिव एनर्जी</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8311</link><description>होली का त्यौहार नजदीक आते ही घर के बड़े बुजुर्ग कहते थे घर से बाहर निकलते समय सावधान रखना. सड़क पर कोई चीज को लांघना नहीं या बच्चों से कहा जाता था, कोई कुछ दे तो उसे खाना नहीं मान्यता है कि होली तक नकारात्मक शक्तियां सक्रिय रहती हैं, इसलिए इस अवधि में विशेष सावधानी बरतने जरूरी होता है. खासकर गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को लेकर घरों में दादी-नानी कई पारंपरिक उपाय अपनाती रही हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होली के 8 दिन पहले का समय शुभ कार्यों से परहेज और साधना-उपासना का होता है. घरों में पूजा-पाठ और भगवान का स्मरण कर सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने पर जोर दिया जाता है.




मान्यता है कि इस दौरान किए गए कुछ उपायों से नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होता है. घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है.


बचाव के लिए बताए गए प्रमुख उपाय
ओम या हनुमान जी का लॉकेट का ताबीज पहनाएं.
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, रामचरितमानस का पाठ करें.
दुर्गा सप्तशती (कवच, अर्गला, कीलक) का पाठ करें.
गर्भवती महिलाओं और बच्चों को घर के अंदर रखें.
अनावश्यक बाहर जाना टालें.
तकिए के नीचे चाकू या घोड़े की नाल रखें.
छोटे बच्चे के माथे या कान के पीछे काला टीका लगाएं.
भीड़भाड़ और विवाद से दूर रखें.</description><guid>8311</guid><pubDate>25-Feb-2026 11:04:00 am</pubDate></item><item><title>Holi 2026 : होली कब है? जानें सही तारीख, शुभ समय और चंद्र ग्रहण का असर </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8304</link><description>Holi 2026 : होली की तिथि को लेकर लोगों में थोड़ा असमंजस है. तो चलिए जानते हैं इस साल होली कब मनाई जाएगी, होलिका दहन की सही तारीख और शुभ समय क्या है. 3 मार्च को होलिका दहन का शुभ समय शाम 6 बजकर 22 मिनट से रात 8 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. इस दौरान पूजा और होलिका दहन करना शुभ माना जाता है. अगले दिन धुरंडी मनाई जाएगी. जबकि होलिका दहन 3 मार्च, मंगलवार को किया जाएगा.




हर साल फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होलिका दहन पूजा की जाती है. रंगों की होलिका दहन आमतौर पर होलिका दहन के अगले दिन खेली जाती है. इस साल होलिका दहन और होली दोनों की तारीखों को लेकर काफी कंफ्यूजन है. इस साल होलिका दहन और होली के बीच एक दिन का गैप है और चंद्र ग्रहण भी है.


होलिका दहन कब होगा?
फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट शुरू होगी और 3 मार्च को शाम 4 बजकर 40 मिनट तक रहेगी. इस दौरान भद्रा भी शुरू हो जाएगी. भद्रा 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट बजे शुरू होगी और 3 मार्च को सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगी. भद्रा काल में शुभ काम नहीं किए जाते हैं, इसलिए भद्रा खत्म होने के बाद ही होलिका दहन किया जाएगा.


चंद्र ग्रहण का असर
यह 3 मार्च को दोपहर 3 बक्कर 21 मिनट से शुरू होगा और शाम 6 बजकर 46 मिनट तक रहेगा. यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा. ग्रहण का सूतक काल सुबह 6 बजकर 20 मिनट शुरू होगा. इसलिए, 3 मार्च को रंग खेलने की परंपरा नहीं निभाई जाएगी और 4 मार्च को होली मनाई जाएगी.</description><guid>8304</guid><pubDate>24-Feb-2026 10:40:44 am</pubDate></item><item><title>हर पूजा में भगवान को क्यों चढ़ाया जाता है नारियल, यहां जानिए कारण </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8293</link><description>हिंदू धर्म में, नारियल किसी भी शुभ मौके पर एक जरूरी चीज है. चाहे भगवान की पूजा हो, कलश स्थापना हो, शादी हो, उपनयन संस्कार हो या बेटी की विदाई हो, हर मौके पर नारियल जरूरी होता है. नई गाड़ी खरीदते समय भी नारियल तोड़ा जाता है और उसका पानी गाड़ी पर छिड़का जाता है. जब भी भक्त कोई इच्छा लेकर मंदिर जाते हैं, तो भगवान को नारियल चढ़ाते हैं. इच्छा पूरी होने पर मंदिर वापस आकर भगवान को धन्यवाद देने का भी रिवाज है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मंदिरों में भगवान को खास तौर पर नारियल क्यों चढ़ाया जाता है?




आइए शास्त्रों पर नजर डालते हैं. शिव पुराण, रुद्र संहिता 14.14 (उपारि श्रीफलं त्वेकं गंधपुष्पदिभिष्ट रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत्) के अनुसार, भगवान को धूप के साथ नारियल चढ़ाने से पूजा का पूरा फ़ायदा मिलता है. गरुड़ पुराण 181 के अनुसार, नारियल के फूल गठिया जैसी बीमारियों को ठीक करते हैं. मत्स्य पुराण 261.43 (पद्म हस्ते प्रदताव्यं श्रीफलं दक्षिणे करे) में दाहिने हाथ में नारियल और बाएं हाथ में कमल रखने का जिक्र है. कूर्म पुराण 39.88 (घृतेन स्नेपयाद रुद्र सपूत श्रीफलं दहेत) में कहा गया है कि हवन में घी मिला नारियल चढ़ाना चाहिए. इससे यह साफ होता है कि नारियल यज्ञ और हवन दोनों में जरूरी है.


नारियल क्यों चढ़ाया जाता है?
संस्कृत में, नारियल को श्रीफलम कहा जाता है और इसे समृद्धि, धन और खुशी की देवी लक्ष्मी को खुश करने के लिए चढ़ाया जाता है. इसका सख़्त बाहरी हिस्सा इंसान के अहंकार का प्रतीक माना जाता है. इसे फोड़ने से समर्पण की भावना जागती है. नारियल का सफेद हिस्सा मन की पवित्रता और पवित्रता का प्रतीक है, जबकि अंदर का पानी विश्वास और प्यार का प्रतीक है. नारियल की तीन आंखें भगवान शिव की त्रिमूर्ति की निशानी हैं, जो पास्ट, प्रेजेंट और फ्यूचर को दिखाती हैं. यह स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को भी दिखाता है. एक धार्मिक मान्यता है कि नारियल को जमीन में गाड़ने से एक नया पेड़ उगता है, जो जीवन के चक्र और पुनर्जन्म के बारे में सिखाता है.</description><guid>8293</guid><pubDate>20-Feb-2026 10:51:13 am</pubDate></item><item><title>Chandra Grahan 2026 : होली पर लगेगा साल का सबसे लंबा चंद्र ग्रहण, इन राशियों को सर्तक रहने से जरूरत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8292</link><description>Chandra Grahan 2026 : साल पहला चंद्र ग्रहण फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर लगेगा. भारत में यह चंद्र ग्रहण दिखने से सूतक काल मान्य होगा. चंद्र ग्रहण 3 मार्च को होली के दिन लगेगा. दोपहर को लगने वाले चंद्र ग्रहण की अवधि 3.27 मिनट की होगी. इसके बाद होलिका दहन किया जाएगा. यह चंद्र ग्रहण सिंह राशि और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में लगने जा रहा है. यह ग्रहण भारत के कुछ हिस्सों में दिखाई देगा. जिसका सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू हो जाएगा.




भारतीय समय के अनुसार चंद्र ग्रहण 3 मार्च को दोहपर 3.20 बजे से शुरू होकर 6.47 बजे तक रहेगा. चंद्र ग्रहण का सूतक काल सुबह 6.20 बजे से शुरू होगा. सूतक काल के दौरान पूजा-अर्चना करना, मूर्तियों को छूना वर्जित होता है. इसलिए इस दौरान मंदिर के पट बंद रहेंगे. इसके साथ ही नई परियोजनाएं शुरू करना और कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है. इस अवधि में खाना बनाना, खाना, यात्रा करना प्रतिबंधित रहता है. ऐसा माना जाता है कि गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों को इस दौरान घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए.


इन राशियों को सतर्क रहने की जरूरत
मेष राशि
चंद्र ग्रहण आपकेलिए अशुभ माना जा रहा है. व्यस्त दिनचर्या और खर्चे बढ़ सकते हैं. बचत करना मुश्किल होगा.


कर्क राशि
आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. आय के स्रोत कमजोर हो सकते हैं. व्यापार में नुकसान और अनावश्यक यात्रा की संभावना है.


सिंह राशि
सिंह राशि में हो ये ग्रहण लगने वाला है. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं. चोट या दुर्घटना का डर. आर्थिक हानि हो सकती है. विवाद से बचना जरूरी.


वृश्चिक राशि
स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है. मानसिक तनाव बढ़ सकता है. करियर संबंधी चुनौतियां आएगी. इसी से उधार लेन-देन ना करें.


मीन राशि
अचानक कार्य में अड़चन आ सकती है. पारिवारिक तनाव बढ़ेगा. बच्चों को लेकर चिंताएं बनी रहेंगी. सफलता के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे.</description><guid>8292</guid><pubDate>20-Feb-2026 10:49:48 am</pubDate></item><item><title>भगवान को भोग लगाते समय कितनी बार बजानी चाहिए घंटी, क्या कहते हैं शास्त्र</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8285</link><description>हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के कई नियम हैं. घर हो या मंदिर पूजा के खास नियम होते हैं. कई घरों में तो ठाकुरजी को रोज भोग लगाने की परंपरा होती है. शास्त्रों में इसे जरूरी माना गया है. हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि भोग लगाते समय घंटी बजाने का भी एक खास नियम है, जिसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है.


घंटी क्यों बजाई जाती है?
पहले यह जान ले घंटी क्यों बजाई जाती है? धार्मिक मान्यता के अनुसार, घंटी की आवाज सृष्टि की शुरुआती ध्वनि से जुड़ी है. कहा जाता है कि घंटी की ध्वनि उन दिव्य ध्वनियों में से एक थी जो सृष्टि की रचना के समय गूंजी थी. इसी वजह से घंटी की आवाज को ओंकार का एक रूप माना जाता है. पूजा के दौरान घंटी बजाने से माहौल शुद्ध होता है. घंटी से सकारात्मक ऊर्जा बहती है. मूर्तियों में चेतना का संचार होता है.


घंटी कितनी बार बजाना चाहिए
शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान हवा के जरिए भोग ग्रहण करते हैं. हवा के पांच तत्व होते हैं, व्यान वायु, उदान वायु, समान वायु, अपान वायु और प्राण वायु. इसलिए, भगवान को भोग लगाते समय इन पांच तत्वों को याद रखना होता है. इन पांच हवा का आह्वान भोज लगाते समय किया जाता है. यही वजह है कि भोग लगाते समय पांच बार घंटी बजाने का विधान है. माना जाता है कि इस तरह भोग की खुशबू देवताओं तक पहुंचती है. वे भोग स्वीकार करते हैं.


भोग लगाने में घंटी का महत्व
भोग लगाने से पहले और बाद में घंटी बजाने से पूजा का असर बढ़ता है. पूजा की जगह की एनर्जी एक्टिवेट होती है. इससे भक्त और देवता के बीच आध्यात्मिक जुड़ाव भी मज़बूत होता है. अक्सर देखा जाता है कि लोग मंदिर से निकलते समय घंटी बजाते हैं, हालाँकि शास्त्रों में इसे गलत माना गया है. वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार, निकलते समय घंटी बजाने से मंदिर की सकारात्मक उर्जा पीछे रह जाती है. इसलिए मंदिर में अंदर जाते समय घंटी बजाना शुभ होता है.</description><guid>8285</guid><pubDate>19-Feb-2026 10:31:53 am</pubDate></item><item><title>शुक्र का राशि परिवर्तन : इन राशियों के लिए खुशियों और समृद्धि लेकर आएगी होली </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8280</link><description>शुक्र को सुख, सुंदरता, धन, दौलत, समृद्धि, प्रेम, वैवाहिक जीवन में ख़ुशी देने वाला ग्रह माना जाता है. शुक्र अभी कुंभ राशि में गोचर कर रहा है. 2 मार्च को होलिका दहन के दिन शुक्र मीन राशि में चले जाएंगे. शुक्र के राशि परिवर्तन का असर 12 राशियों पर पड़ेगा. ज्योतिष के अनुसार, मीन राशि शुक्र की उच्च राशि है. इस राशि में होने पर शुक्र बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली हो जाता है. इसके परिणामस्वरूप, रिश्तों, धन, भौतिक सुख-सुविधाओं, कला, क्रिएटिविटी और पैसे के मामलों में अच्छे बदलाव देखने को मिलते हैं.शुक्र की कृपा से जीवन में खुशी, आकर्षण और समृद्धि बढ़ती है. कई लोगों के लिए यह समय प्रेम संबंधों को मजबूत करने, शादीशुदा जिंदगी में मिठास घूमने का समय बन सकता है. इस परिवर्तन का इन राशियों को सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है.




वृषभ राशि
शुक्र इस राशि का स्वामी है. इसलिए, अचानक धन लाभ आय के नए सोर्स और चीजों की सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी हो सकती है. नौकरी पैसा लोगों को सम्मान मिलेगा. आर्ट, फ़ैशन, डिजाइन या मीडिया से जुड़े लोगों के लिए बड़े मौके मिलेंगे. प्रेम संबंध मजबूत होंगे. जीवनसाथी के साथ अच्छे रिश्ते बढ़ेंगे.


तुला राशि
तुला राशि वालों को नौकरी में प्रमोशन और कारोबार में लाभ मिल सकता है. रुके हुए काम पूरे होंगे. आर्थिक स्थिरता आएगी. इनकम में बढ़ोतरी के संकेत हैं. पार्टनरशिप ममें लाभ मिलेगा. सेहत में सुधार होगा. रोजाना की इनकम के सोर्स मज़बूत होंगे. शादीशुदा जिंदगी में रोमांस बढ़ेगा. जीवनसाथी का पूरा सपोर्ट मिलेगा.


मकर राशि
यह समय इन्वेस्टमेंट से फायदा दिलाएगा. प्रॉपर्टी खरीदने या बड़े फैसले लेने के लिए समय अच्छा है. समाज में मन सम्मान बढ़ेगा. नए संबंध लाभकारी साबित होंगे. छोटी यात्राएं से फायदा होगा. भाई-बहनों का भी सपोर्ट मिलेगा. प्रेम संबंधों में सकारात्मक बदलाव होंगे.


मीन राशि
यह समय शुभ रहेगा. पैसे की दिक्कतें हल हो सकती हैं. परिवार में खुशियां बढ़ेगी. हायर एजुकेशन या प्रतियोगी परीक्षा में अच्छे नतीजे मिलेंगे. धार्मिक यात्रा हो सकती है. आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा. प्रेम संबंध स्थिर होंगे. इस गोचर के दौरान आप संतुष्ट महसूस करेंगे.</description><guid>8280</guid><pubDate>18-Feb-2026 11:30:23 am</pubDate></item><item><title>बुध ग्रह के अस्त होने पर इन 4 राशियों ​को होगी उन्नति </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8274</link><description>ग्रह के राजकुमार बुधदेव कुंभ राशि में 28 फरवरी को अस्त होंगे. ज्योतिष शास्त्र में बुध को बुद्धि, वाणी, संचार, तर्क और गणति के साथ व्यापार का स्वामी माना जाता है. 12 राशियों में बुध को मिथुन और कन्या राशि का स्वामी माना गया है. बुध ग्रह के शुभ प्रभावों में जातक कुशल वक्ता, लेखक, दार्शनिक, शिक्षक, व्यंग्यकार, वाणिज्य एवं गणित में महारत हासिल करता है. बुध के प्रसन्न होने से दूरसंचार, नेटवर्किंग, पर्यटन सेवा, हास्य कलाकार के कार्यों में जातक का रूझान या निपुण होता है.




सामान्यतः किसी ग्रह के अस्त होने से उसकी प्रभाव शक्ति में कमी आ जाती है. लेकिन इस बार स्थिति अलग मानी जा रही है. कुछ राशियों के लिए बुध का यह परिवर्तन राजयोग जैसे फल, नौकरी, व्यापार में उन्नति और आर्थिक लाभ के अवसर लेकर आ सकता है. आइए जानते हैं किन राशियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ सकता है.


मिथुन राशि
मिथुन राशि के स्वामी बुधदेव है. इसलिए इसका असर आप पर सबसे अधिक दिखाई देगा. इस दौरान आपका आत्म विशवास मजबूत रहेगा. आपके निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होगी. रुके हुए काम धीरे-धीरे पटरी पर आएंगे. नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन या नई जिम्मेदारों से नावाजा जा सकता है. आपकी संचार कौशल की बदोलत आपको बड़ी कामयाबी मिल सकती है. ससुराल पक्ष से आ​र्थिक मदद के संकेत मिल सकते हैं. बता दें कि बुध 13 मार्च को दोबारा उदय होंगे.


कन्या राशि
कन्या राशि वालों के लिए यह समय आपके आर्थिक क्षेत्र को मजबूत करेगा. आमदनी में बढ़ोतरी के मौके मिल सकते हैं. अगर आप निवेश करने की सोच रहे हैं, तो 13 मार्च के बाद कदम उठाना शुभ रहेगा. स्वास्थ्य पहले से बेहतर रहेगी. पुराने कर्ज से छुटकारा मिल सकता है. कारोबार करने वालों को अच्छा लाभ मिलने की संभावना है.


तुला राशि
तुला राशि जातकों के लिए यह समय आपकी प्रेम संबंधों में पॉजिटिव बदलाव ला सकता है. क्रिएटिव कामों में दिलचस्पी बढ़ेगी. नए प्रोजेक्ट सफल हो सकते हैं. आपको अपने बच्चों से अच्छी खबरें मिल सकती है. कारोबार में नए कॉन्टैक्ट फायदेबंद साबित होंगे. समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ेगा.


धनु राशि
धनु राशि वालों के लिए यह समय हिम्मत के साथ आत्मविश्वास बढ़ाने वाला होगा. आपको अपने भाई-बहनों से सहयोग मिलेगा. छोटी यात्रा का फायदा होगा. कार्य क्षेत्र में आपके कार्य की प्रशन्नसा होगी. सीनियर्स से मिलने वाले सपोर्ट से तरक्की के मौके मिल सकते हैं.</description><guid>8274</guid><pubDate>17-Feb-2026 10:32:16 am</pubDate></item><item><title>Solar Eclipse 2026 : कल फाल्गुनी अमावस्या पर लगेगा सूर्य ग्रहण, इन जगहों पर देगा दिखाई, जानिए सूतक का समय </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8273</link><description> फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी को मनाई जाएगी. पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास से क्या आवश्यक तिथि 16 फरवरी सोमवार शाम 5: 34 बजे से शुरू होकर 17 फरवरी मंगलवार शाम 5:30 तक रहेगी. उदय तिथि के अनुसार अमावस्या का व्रत और स्नान दान 17 फरवरी के दिन ही किया जाएगा.




धार्मिक मान्यता के अनुसार अमावस्या तिथि पर पितरों के लिए किया गया तर्पण और दान से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है. इस बार अमावस्या पर सूर्य ग्रहण भी लगने जा रहा है. ऐसे में सूर्य ग्रहण के कारण फाल्गुन अमावस्या पर होने वाला स्नान दान और पितृ दर्पण कब किया जाएगा. इसको लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति है.


सूर्य ग्रहण कहां दिखेगा, सूतक रहेगा की नहीं
यहां राहत की बात यह है कि साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा. जब सूर्य ग्रहण ही नहीं दिखेगा तो इसका सूतक नियम का पालन नहीं किया जाएगा. बता दें कि यह ग्रहण अटलांटिक और अर्जेंटीना, चिली, कोमोरोस, मॉरीशस, आईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया जैसे देशों में दिखाई देगा.


सूर्य ग्रहण की समय अवधि
साल का पहला सूर्य ग्रहण भारतीय समय अनुसार दोपहर 3:26 बजे से शाम 7:57 बजे तक होगा. इस ग्रहण का पीक समय जिसे मध्यकाल कहते हैं 5:42 बजे पर होगा. यदि यह ग्रहण भारत में दिखाई देता तो सूतक काल 12 घंटे पहले से माना जाता.
</description><guid>8273</guid><pubDate>17-Feb-2026 10:28:00 am</pubDate></item><item><title>Holashtak 2026 : इस तरीख से शुरू होंगे होलाष्टक, यह कार्य आठ दिन रहेंगे वर्जित </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8272</link><description>Holashtak 2026 : हर साल की तरह इस साल भी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक प्रारंभ हो रहे हैं. साल 2026 में 24 फरवरी से होलाष्टक शुरू हो जाएंगे. इसका समापन 3 मार्च को होलिका दहन के दिन होगा. मान्यता है कि होलाष्टक के इन आठ दिनों में ग्रह उग्र अवस्था में रहते हैं. इस दौरान कई कार्यों को करने की मनाही होती है. पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 24 फरवरी, मंगलवार को सुबह 7 बजकर 02 मिनट से होगी. अगले दिन शाम तक जारी रहेगी. इसी तिथि की शुरुआत के साथ ही होलाष्टक का समय शुरू माना जाता है.




हिंदू धर्म में होली के त्योहार का खास महत्व है. होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है. होली के समय होलाष्टक का खास महत्व होता है. होलाष्टक होलिका दहन से आठ दिन पहले लगता है. फाल्गुन अष्टमी से होलिका दहन तक 8 दिनों तक होलाष्टक के दौरान मांगलिक और शुभ कार्य विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, मकान-वाहन की खरीदारी की मनाही होती है. हालांकि देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए ये दिन बहुत श्रेष्ठ माने गए हैं. होलाष्टक शब्द होली और अष्टक से मिलकर बना है. इसका मतलब है होली के आठ दिन.


इसलिए लगते हैं होलाष्टक
मान्यता के अनुसार राजा हरिण्यकश्यप बेटे प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति से दूर करना चाहते थे. उन्होंने 8 दिन प्रहलाद को कठिन यातनाएं दी. इसके बाद आठवें दिन बहन होलिका के गोदी में प्रहलाद को बैठा कर जला दिया, लेकिन फिर भी भक्त प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ. इन आठ दिनों में प्रहलाद के साथ जो हुआ. उसके कारण होलाष्टक लगते हैं. वहीं नई शादी हुई लड़कियों को ससुराल की पहली होली देखने की मनाही भी होती है.</description><guid>8272</guid><pubDate>17-Feb-2026 10:25:45 am</pubDate></item><item><title>Mahashivratri 2026 : महादेव के अभिषेक के लिए ये है 4 शुभ मुहूर्त, महाशिवरात्रि पर मिलेगी उनकी कृपा </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8265</link><description>Mahashivratri 2026 : महाशिवरात्रि का पर्व को लेकर पूरे देश में तैयारियां चल रही हैं. इस दिन महादेव की पूजा के लिए कई खास शुभ योग बन रहा है. इस साल महाशिवरात्रि 15 फरवरी को मनाई जाएगी. महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ को जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है. सुबह जल्दी उठकर, भगवान शिव का ध्यान करके, चांदी या चांदी की थाली में शुद्ध जल और गंगाजल मिलाकर अभिषेक करने और ओम नमः शिवाय का जाप करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं.




पंचांग के अनुसार, फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि शिव भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इस शुभ रात को भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था. इसलिए, इस दिन को शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है. महाशिवरात्रि पर भक्त सुबह-सुबह भगवान महादेव की पूजा शुरू करते हैं, जो रात के चौथे पहर तक चलती है. ऐसे में इस समय जलाभिषेक करना बहुत फलदायी होता है.


महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का शुभ समय
इस बार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का जल अभिषेक करने के लिए भक्तों को दिन भर में कई शुभ समय मिलेंगे.


पहला मुहूर्त सुबह 8:24 बजे शुरू होगा और सुबह 9:48 बजे तक रहेगा.
दूसरा मुहूर्त सुबह 9:48 से 11:11 बजे तक रहेगा.
तीसरा मुहूर्त सुबह 11:11 से दोपहर 12:35 बजे तक रहेगा. इसे बहुत फलदायी बताया गया है.
चौथा मुहूर्त शाम 6:11 से 7:45 बजे तक रहेगा.</description><guid>8265</guid><pubDate>15-Feb-2026 12:01:35 pm</pubDate></item><item><title>शनि प्रदोष पर दुर्लभ संयोग, साढ़े साती और ढैय्या की पीड़ा से बचने के उपाय करें</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8262</link><description> हर महीने भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस बार यह 14 फरवरी, शनिवार ये व्रत रखा जाएगा। त्रयोदशी ​तिथि शनिवार को पड़ने के कारण इसे शनि प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने और व्रत रखने से भक्तों के सभी पाप दूर हो जाते हैं और उन्हें सुख-समृद्धि मिलती है। साथ ही साथ शनिदेव की पूजा करने से साढ़ेसाती और ढैय्या से पीड़ित जातकों को भी राहत मिलेगी।


शनि प्रदोष व्रत की तिथि और शुभ समय


त्रयोदशी तिथि शुरू  14 फरवरी  शाम 4:01 बजे
त्रयोदशी तिथि खत्म  15 फरवरी  शाम 5:04 बजे
प्रदोष पूजा मुहूर्त  शाम 6:10 बजे से रात 8:44 बजे तक


शनि प्रदोष व्रत का महत्व


शास्त्रों में कहा गया है कि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने से भक्तों को विशेष लाभ मिलता है। इससे पारिवारिक जीवन में भी लगातार सुख-समृद्धि बनी रहती है। जो लोग सच्चे मन से यह व्रत करते हैं, उन्हें संतोष, धन और अच्छी सेहत मिलती है।


साढ़े साती और ढैय्या के उपाय


ज्योतिषियों के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत के दिन शनिदेव को उड़द की दाल और लोहे की कील चढ़ाएं। इससे साढ़े साती और ढैय्या का असर कम होता है। इस दिन शनि देव के बीज मंत्र ॐ शनैश्चराय नमः का कम से कम 30 बार जाप करें। इससे जीवन के दु:ख जल्दी दूर होंगे। इस दिन एक लोहे का बर्तन लें। उसमें सरसों का तेल भरें। एक लाल फूल रखें। इस बर्तन को घर के बीच वाले हिस्से यानी ब्रह्मस्थान में रखें। इससे घर में पॉजिटिव एनर्जी बढ़ती है। इस दिन पीपल के पेड़ की जड़ों में जल चढ़ाएं। शाम को पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाएं। शनिवार के दिन हनुमान जी की खास पूजा-अर्चना करें। ऐसा करने से सभी तरह के शनि दोष दूर होते हैं।


प्रदोष व्रत पूजा विधि


प्रदोष व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-ध्यान करने के बाद महादेव का स्मरण करें। प्रदोष व्रत करने का संकल्प लें और भगवान शिव की पूजा शुरू करें। भगवान शिव को जल चढ़ाएं और सफेद फूल, माला, शमी, धतूरा, बेलपत्र, भांग, चीनी और शहद भगवान शिव का अभिषेक करें। चंदन का लेप और बिना टूटे चावल चढ़ाना न भूलें। पूजा के बाद भोलेनाथ को पुवा, हलवा या चनें का भोग लगाएं। दीपक जलाकर शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा पढ़ें। आखिर में आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद बांटें।</description><guid>8262</guid><pubDate>14-Feb-2026 10:12:39 am</pubDate></item><item><title>होलिका दहन को लेकर है काफी ज्यादा कंफ्यूजन, इस बार होली पर है भद्रा का साया </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8261</link><description>होलिका दहन फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को किया जाता है. पंचांग के अनुसार इस साल होलिका दहन 2 मार्च को होगा. तीन साल बाद फिर होलिका दहन पर भद्रा का साया पड़ने से होलिका दहन के समय को लेकर असमंजस कीस्थिति बनी हुई है. होलिका दहन हमेशा प्रदोष काल में शुभ माना जाता है. शास्त्रों के मुताबिक, होलिका दहन तय समय पर ही करना चाहिए. इस बार होलिका दहन को लेकर तीन मुख्य रुकावटें सामने आ रही हैं. पहला तो भद्रा काल को होलिका दहन में सबसे बड़ी रुकावट माना जाता है.




भद्राकाल के दौरान होलिका दहन करना अशुभ होता है. अगर भद्रा काल की रात हो, तो भद्रा काल खत्म होने के बाद ही दहन उचित होगा. इसके अलावा, इस साल पूर्णिमा की तारीख को लेकर भी असमंजस बना है. इसलिए, होलिका दहन उदया तिथि और प्रदोष काल के सही मेल को ध्यान में रखकर करना चाहिए. तीसरा कारण होलिका दहन के दौरान कुछ अशुभ योग बन सकते हैं, जो पूजा और दहन के समय पर असर डाल रहे हैं. राहु काल या दूसरे अशुभ समय में होलिका दहन नहीं करना चाहिए.


होलिका दहन का समय
शास्त्रों के अनुसार, भद्रा का साया 2 मार्च को शाम 5 बजकर 18 मिनट से शुरू होगा और अगले दिन 3 मार्च को सुबह 4 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। इसलिए, 2 मार्च को सुबह 12 बजकर 50 मिनट जे से पहले, भद्रा काल में या 3 मार्च की सुबह भद्रा खत्म होने के बाद होलिका दहन करना है। शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन पूर्णिमा के दिन प्रदोष काल में किया जाता है।


होलिका दहन सही समय पर क्यों किया जाता है?
होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है। सही समय पर होलिका दहन करने से जीवन से नाकारात्मक, डर और रुकावटें दूर होती हैं। इसलिए 2026 में होलिका दहन करते समय पंचांग देखकर बताए गए रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करना और भद्रा योग और अशुभ योग से बचना फलदायी होगा।</description><guid>8261</guid><pubDate>14-Feb-2026 10:10:42 am</pubDate></item><item><title>Vijaya Ekadashi : फाल्गुन में जानिए कब है विजया एकादशी, शत्रुओं पर मिलेगी आपको विजय</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8255</link><description>भगवान विष्णु की पूजा के लिए एकादशी व्रत का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। फिर अगर फाल्गुन मास में पड़ने वाले । एकादशी की बात करे तो उसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। फाल्गुन में पहला एकादशी का व्रत ​विजया एकादशी के नाम से पड़ेगा। फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली विजया एकादशी की सही तारीख क्या है? किस दिन इसका व्रत रखा जाएगा और किस दिन होगा इसका पारण होगा इसे हम जानते हैं।


विजया एकादशी व्रत की सही तारीख
हिंदू धर्म में फाल्गुन मास में पड़ने वाली जिस विजया एकादशी व्रत को सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना गया है वह व्रत 13 फरवरी 2026, शुक्रवार के दिन रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन यानि 14 फरवरी 2026, शनिवार की सुबह 06:35 से लेकर 08:52 बजे के बीच होगा।




क्यों महत्वपूर्ण है विजया एकादशी ?
जैसा कि आपको नाम से स्पष्ट है, विजया एकादशी यानी विजय दिलाने वाली एकादशी। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। व्रत करने से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं से परेशान है या जीवन में बार-बार बाधाओं का सामना कर रहा है, तो यह व्रत उसे सफलता दिलाएगा। विजया एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। स्वास्थ्य ठीक हो तो केवल जल पर व्रत रखें। यदि स्वास्थ्य साथ न दे तो फलाहार के साथ व्रत कर सकते है।


इस मंत्र का करे जाप
इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें. सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र है  ऊं नमो भगवते वासुदेवाय, इस मंत्र का श्रद्धा से जाप करते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करे।</description><guid>8255</guid><pubDate>13-Feb-2026 10:54:08 am</pubDate></item><item><title>17 फरवरी को फाल्गुन अमावस्या ! जानें शुभ मुहूर्त से लेकर पूजा विधि, मिलेगी पितृ दोष से मुक्ति</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8254</link><description>पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए फाल्गुन अमावस्या का दिन उत्तम माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने से पितृ दोष की समस्या से मुक्ति मिलती है और पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है.




फाल्गुन अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी को मनाई जाएगी.
फाल्गुन माह अमावस्या तिथि की शुरुआत- 16 फरवरी को शाम को 05 बजकर 34 मिनट पर
फाल्गुन माह अमावस्या तिथि का समापन- 17 फरवरी को शाम को 05 बजकर 30 मिनट परब्रह्म मुहूर्त- 05 बजकर 16 मिनट से 06 बजकर 07 मिनट तक
अमृत काल  सुबह 10 बजाकर 39 मिनट से दोपहर 12 बजकर 17 मिनट तक
विजय मुहूर्त  दोपहर 02 बजकर 28 मिनट से 03 बजकर 13 मिनट तक
गोधूलि मुहूर्त  शाम 06 बजकर 10 मिनट से 06 बजकर 36 मिनट तक
फाल्गुन अमावस्या पूजा विधि
फाल्गुन अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें.
तांबे के लोटे में लाल फूल, अक्षत और जल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें.
इसके बाद काले तिल और जल लेकर पितरों को अर्पित करें. एक बात का खास ध्यान रखें कि आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए.
देसी घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करें.
मंदिर या गरीब लोगों में गुड़, तिल, कंबल, अनाज और धन समेत आदि चीजों का दान करें.</description><guid>8254</guid><pubDate>13-Feb-2026 10:52:02 am</pubDate></item><item><title>फाल्गुन मास में पड़ने वाले हैं कई व्रत और त्यौहार, अभी से कर लीजिए तैयारी</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8248</link><description>फाल्गुन में भगवान श्रीकृष्ण और महादेव की साधना करने का विशेष महत्व है, क्योंकि इस माह में होली और महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) समेत कई व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, तो ऐसे में आइए जानते हैं कि फाल्गुन में कब कौन-सा व्रत और त्योहार मनाया जाएगा।




जानिए तारीख और व्रत, त्योहार
02 फरवरी फाल्गुन की शुरुआत
05 फरवरी द्विजप्रिय संकष्टी
07 फरवरी यशोदा जयंती
08 फरवरी भानु सप्तमी, शबरी जयन्ती
09 फरवरी जानकी जयंती , कालाष्टमी, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी
13 फरवरी कृष्ण भीष्म द्वादशी, कुम्भ संक्रान्ति, विजया एकादशी
14 फरवरी शनि त्रयोदशी, शनि प्रदोष व्रत
15 फरवरी महाशिवरात्रि
17 फरवरी सूर्य ग्रहण, फाल्गुन अमावस्या
19 फरवरी फुलेरा दूज
21 फरवरी ढुण्ढिराज चतुर्थी
22 फरवरी स्कन्द षष्ठी
23 फरवरी मासिक कार्तिगाई
24 फरवरी होलाष्टक शुरू, मासिक दुर्गाष्टमी
25 फरवरी रोहिणी व्रत
27 फरवरी आमलकी एकादशी
01 मार्च रवि प्रदोष व्रत
03 मार्च होलिका दहन
04 मार्च होली</description><guid>8248</guid><pubDate>12-Feb-2026 10:57:09 am</pubDate></item><item><title>परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र रोज करे इन मंत्रों का जाप, पढ़ाई में लगने लगेगा मन </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8247</link><description>फरवरी का महीना शुरू होते ही बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता को भी पढ़ाई की चिंता सताने लगती है. अगर आपके बच्चे का भी पढ़ाई में मन नहीं लगता है और एकाग्रता की कमी लगती है तो अपने बच्चों को रोज नियमित कुछ मंत्रों का जाप करवाएं. इससे पढ़ाई में मन तो लगेगा ही साथ ही एकाग्रता भी बढ़ेगी.




करें इन तीन मंत्रों का जाप
ॐ सरस्वत्यै नमः  विद्या और बुद्धि की देवी सरस्वती की कृपा पाने के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है. कहा जाता है कि इसका नियमित जाप करने से स्मरण शक्ति तेज होती है और पढ़ाई के प्रति लगाव बढ़ाता है. पढ़ाई शुरू करने से पहले इस मंत्र का 11 बार जप करें. इससे मन अधिक स्थिर और ध्यान केंद्रित रहता है.


ॐ शुभम करोति कल्याणम्  यह मंत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और मन के तनाव को कम करने में मदद करता है. यदि छात्र इसे प्रतिदिन 1 से 2 मिनट शांत मन से दोहराते हैं, तो पढ़ाई का वातावरण अधिक सौम्य और अनुकूल महसूस होता है. यह अभ्यास विद्यार्थियों को मानसिक रूप से तैयार करता है ताकि वे पढ़ाई पर बेहतर तरीके से ध्यान केंद्रित कर सकें.


सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने। विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते॥  यह मंत्र ज्ञान, वाणी, बुद्धि और सीखने की क्षमता को बढ़ावा देने के लिए लाभकारी माना जाता है. इसे शांत मन से जपने पर मानसिक स्पष्टता बढ़ती है और भ्रम दूर होते हैं.


ॐ गं गणपतये नमः  गणेश जी का यह प्रसिद्ध मंत्र बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है. छात्र यदि सुबह या पढ़ाई शुरू करने से पहले इस मंत्र को 11 या 21 बार जपते हैं, तो मन शांत होता है. साथ ही नई शुरुआत के लिए ऊर्जा मिलती है. यह पढ़ाई में आ रही मानसिक रुकावटों को कम करने में मदद करता है.</description><guid>8247</guid><pubDate>12-Feb-2026 10:55:31 am</pubDate></item><item><title>Mahashivratri 2026 : इस मुहूर्त पर करे भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा, भगवान की होगी असीम कृपा</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8246</link><description>Mahashivratri 2026 : महाशिवरात्रि यानि भगवान महादेव और माता पार्वती का विवाह दिन. इस दिन भगवान की असीम कृपा पाने के लिए चार पहर की पूजा किया जाना चाहिए. इस पूजा को करके आप भगवान का आशीर्वाद ले सकते हैं. समय के अनुसार अगर विधिवत पूजा की जाए तो इससे भगवान अपनी सदा कृपा आप पर बनाए रखेंगे.




चार पहर की पूजा का समय
प्रथम प्रहर पूजा: 15 फरवरी शाम 6:11 बजे से रात 9:22 बजे तक.


द्वितीय प्रहर पूजा: 15 फरवरी रात 9:23 बजे से 16 फरवरी रात 12:34 बजे तक.


तृतीय प्रहर पूजा: तृतीय प्रहर पूजा: 16 फरवरी रात 12:35 बजे से सुबह 3:46 बजे तक.


चतुर्थ प्रहर पूजा: 16 फरवरी सुबह 3:46 बजे से सुबह 6:59 बजे तक किया जाना चाहिए.


इसके अलावा, निशीथ काल पूजा 16 फरवरी की रात 12:09 बजे से 1:01 बजे तक की जा सकती है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है.</description><guid>8246</guid><pubDate>12-Feb-2026 10:54:11 am</pubDate></item><item><title>मंगल दोष से परेशान हैं तो आज ही अपनाए यह उपाय, दूर हो जाएगी परेशानी</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8244</link><description>मंगल दोष कई तरह से लोगों को परेशान कर सकता है जिसे मंगल दोष है उसे इससे जुड़े उपाय कर इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है.ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को ग्रहों का सेनापति कहा गया है. इसे उग्र ग्रह माना गया है. कुंडली में मंगल की दशा यदि खराब हो तो इससे मंगल दोष होता है और व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल दोष होने से विवाह होने में कई तरह की परेशानी होती है या विवाह में देरी भी होती है. यदि विवाह हो भी जाए तो विवाह के बाद भी वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता और कई तरह की परेशानियां जीवन में लगी रहती है. इसलिए विवाह से पहले यह जान लेना चाहिए कि क्या कुंडली में मंगल दोष है या नहीं. यदि मंगल दोष है तो ज्योतिष उपायों की मदद से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है.


क्या है मंगल दोष
ज्योतिष के अनुसार किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह के कुछ निश्चित भाव में होने से मंगल दोष बनता है. मंगल जब किसी व्यक्ति की कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में बैठा हो तो, इससे मांगलिक या मंगल दोष बनता है. मंगल ग्रह की ऐसी स्थिति वैवाहिक जीवन के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है. इसके अलावा कुछ ज्योतिष तो मंगल दोष को तीन लग्न (चंद्र, सूर्य और शुक्र) से भी देखते है. विवाह और वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियों से बचने के लिए लड़का या लड़की को मंगल दोष दूर करने के उपायों को जरूर कर लेना चाहिए.




मंगल दोष के लक्षण
जिसकी कुंडली में मंगल दोष होता है, उसके विवाह में कई तरह की परेशानियां आती है. विवाह में देरी होना, किसी कारण रिश्ता टूट जाना या विवाह के बाद जीवनसाथी के अच्छा तालमेल न बैठना. ये सभी मंगल दोष के प्रभाव से होते हैं.
यदि किसी की कुंडली के सातवें भाव में मंगल दोष हो तो ऐसे में पति-पत्नी के बीच हमेशा मनमुटाव होता रहता है. कभी-कभी लड़ाई-झगड़े इतने बढ़ जाते हैं कि यह तनाव, टकराव और तलाक का कारण भी बन जाती है.
विवाह के अलावा मंगल दोष होने से व्यक्ति कर्ज के बोझ में भी डूबा रहता है या फिर जमीन-जायदाद से जुड़ी समस्याएं लगी रहती है.
कुंडली के द्वादश भाव में मंगल दोष होने से वैवाहिक जीवन के साथ ही शारीरिक क्षमताओं में कमी, क्षीण आयु, रोग द्वेष और कलह-क्लेश को जन्म देता है.
मंगल दोष होने से व्यक्ति का स्वभाव गुस्सैल, क्रोधिक और अहंकारी हो जाता है.
ससुराल पक्ष से रिश्ते खराब होने या बिगड़ने की वजह भी मंगल दोष होता है.


मंगल दोष के लिए उपाय
मंगल दोष के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए मंगल ग्रह की शांति पूजा करें करें.
मंगलवार के दिन व्रत रखें और हनुमान मंदिर जाकर बूंदी का प्रसाद बांटे.
मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें.
मंगलवार के दिन लाल रंग के कपड़े पहनकर पूजा करें और हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं.
मंगल ग्रह की शांति के लिए तीन मुखी रुद्राक्ष या फिर मूंगा रत्न ज्योतिषी की सलाह से धारण करें तो शुभ रहेगा.
घर आए मेहमानों को मिठाई खिलाने से कुंडली में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है.


कुंडली में मंगल दोष है तो विवाह से पहले नीम का पेड़ लगाएं और 43 दिनों तक कम से कम पेड़ की देखरेख करें. इससे भी मंगल दोष दूर हो जाता है.</description><guid>8244</guid><pubDate>11-Feb-2026 11:29:15 am</pubDate></item><item><title>होली पर चंद्र ग्रहण का साया, जानिए सूतक और ग्रहण काल</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8243</link><description>साल का पहला चंद्र ग्रहण मार्च में पड़ने वाला है. इस दिन होलिका दहन भी है. 3 मार्च 2026 को लगने वाला यह चंद्र ग्रहण साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण होगा. चंद्र ग्रहण का जो विधान है, वह पूर्णिमा तिथि का जो अंत होता है, उस समय में ग्रहण का विधान दिया गया है.


इस साल चंद्र ग्रहण 3 मार्च 2026 को पड़ेगा, जो शाम 5:50 बजे बाद लगेगा, यानी ग्रहण का आरंभ होगा, जो 6:46 के बाद मुक्ति प्रदान होगी, जिसे मोक्ष स्नान का विधान कहा गया है.


ग्रहण के बाद आप खुद स्थान कर भगवान को स्नान कर पूजा कर सकते है. इसमें खास करके गंगा नदियों में स्नान का विशेष महत्व दिया गया है. जो गंगा नदी नहीं जा सकते वह सामान्य जल में भी कर सकते है. स्नान करने के बाद दान, जप, होम करना चाहिए.




इसके अलावा अपनी समर्थ के अनुसार गोदान और स्वर्ण दान करें. ग्रहण के ही दिन होलिका दहन है. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, चंद्र ग्रहण के चलते होलिका दहन ग्रहण समाप्त होने के बाद ही किया जाएगा.</description><guid>8243</guid><pubDate>11-Feb-2026 11:27:34 am</pubDate></item><item><title>क्या आप भी लगाते हैं रोज तिलक, जानिए इसके वैज्ञानिक फायदे</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8240</link><description>तिलक का अर्थ पूजा के समय माथे पर लगाए जाने वाला शुभ चिह्न है। हर तिलक का अलग-अलग महत्व है। संत कुमकुम, चंदन, हल्दी व भस्म का तिलक लगाते हैं। मान्यता है कि माथे के मध्य भाग में तिलक लगाने से एकाग्रता, संयम, आत्म शक्ति में वृद्धि होती है।


तिलक न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह आपकी एक अलग छवि बनाता है साथ ही इससे आपके व्यक्तित्व में भी विकास होता है।




वैज्ञानिक फायदे
तिलक का प्रयोग करने से हमारे मस्तिष्क की तंत्रिकाएं शांत मुद्रा में रहती हैं। इससे सिरदर्द जैसी गंभीर समस्या दूर रहती है। अनिद्रा या तनाव हाेने पर माथे के बीच में मालिश करके चंदन का तिलक लगाना चाहिए।


तिलक लगाने से व्यक्ति की एकाग्रता शक्ति बढ़ती है और शरीर में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। अगल अलग तरह के तिलक लगाने से इसके अलग फायदे भी होते हैं। इससे आज्ञा चक्र की शुद्धि होती है। ज्ञान की प्राप्ति होती है। केसर का तिलक लगाने से मस्तिष्क को शीतलता प्राप्त होती है।


वहीं, चंदन का तिलक दिमाग को शीतलता प्रदान करता है। इससे मानसिक शांति बनी रहती है। भस्म का तिलक लगाने से मस्तिष्क विषाणुओं से मुक्त रहता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह निरंतर बना रहता है।




तीन प्रकार के होते हैं तिलक
हिंदू धर्म में तीन तरह के तिलक होते हैं- वैष्णव तिलक (वैष्णव तिलक का महत्व), शैव तिलक और शाक्त तिलक। इन तीन प्रकार के तिलकों के भीतर अनेकों सम्प्रदाय के अपने-अपने अलग तिलक हैं। वैष्णव तिलक वह लगाते हैं जो भगवान विष्णु के अनुयायी होते, शैव भगवान शिव के भक्त त्रिकुंड तिलक लगाते है। वहीं,शाक्त तिलक एक बिंदी के रुप में भगवती के भक्त लगाते है। हिन्दू धर्म के अनुसार हर व्यक्ति को रोज तिलक लगाना चाहिए।</description><guid>8240</guid><pubDate>10-Feb-2026 8:44:43 am</pubDate></item><item><title>मंगलवार का दिन हनुमानजी की आराधना के लिए बेहद खास ! करिए यह खास उपाय दूर हो जाएगी जीवन में आई कठिनाई</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8239</link><description>मंगलवार का दिन भगवान हनुमानजी की आराधना के लिए बेहद खास माना गया है। इस दिन हनुमान चालीसा का पाठ करने के साथ चोला चढ़ा कर आप भगवान की असीम कृपा पा सकते हैं। इसके साथ इस दिन कुछ ऐसे कई उपाय हैं जिसे मंगलवार को किए जाने से कर कष्ट दूर हो सकते हैं।


मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा/बजरंग बाण पाठ करें
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या मारुति स्तोत्र का पाठ करें, खासकर 40 मंगलवार तक पाठ करने से विशेष सुखदाई होता है। इस तिलक का करें उपयोग हनुमान मंदिर से लाए गए सिंदूर का तिलक माथे पर लगाना बहुत ही अच्छा होता है। इससे बुरे सपने नहीं आते और संकट टलते हैं।




राम नाम का स्मरण
मंगलवार के दिन की शुरुआत श्री राम के उच्चारण से करें, क्योंकि हनुमान जी को राम नाम से प्रेम है। जितना हो सकें इसका जाप करें।


तुलसी की माला
तुलसी के 108 पत्तों पर राम का नाम लिखकर इसे भगवान हनुमान को पहनाएं। इस उपाय को लगातार 40 मंगलवार तक जरूर अपनाएं। ऐसा करने से भगवान हनुमान प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा भक्त पर बनी रहेगी। अगर इस उपाय को करने से हनुमानजी के साथ-साथ भगवान श्री राम की भी आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में आ रही समस्याओं से छुट्टी मिलती है।


लाल जनेऊ का चमत्कार
मंगलवार के दिन सुबह जल्दी स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद, हनुमान मंदिर जाकर बजरंगबली को लाल जनेऊ पहना दें। इस उपाय को मंगलवार के दिन करना बहुत लाभकारी माना जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति के कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं और बिगड़े हुए काम बनने शुरू हो जाते हैं। बुरी चीजों का प्रभाव खत्म होता है और जीवन में खुशहाली आती है।</description><guid>8239</guid><pubDate>10-Feb-2026 8:43:27 am</pubDate></item><item><title> फाल्गुन अमावस्या को करें पितरों को लिए यह कर्म, मिलेगी पितृ दोष से मुक्ति</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8238</link><description>हिन्दू धर्म में फाल्गुन के मास का विशेष महत्व है। इस महीने में पड़ने वाली अमावस को पितरों की शांति के लिए कई कर्म कर सकते हैं। इससे आपको पितृ दोष से भी मुक्ति मिल सकती है। फाल्गुन अमावस्या को पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है। इससे आपके द्वारा किया हुआ दान और कर्म पितरों तक पहुंचता है। ये दिन विशेष रूप से पितृ तर्पण, पितृ शांति, और पितृ-दोष निवारण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।


पंचाग के अनुसार इस साल फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि 16 फरवरी, सोमवार की शाम 05:34 बजे से शुरू हो रहीं है जो अगले दिन 17 फरवरी, मंगलवार को सायंकाल 05:30 बजे तक रहेगी। इसलिए साल 2026 में फाल्गुन अमावस्या 17 फरवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा।


यह करे उपाय
फाल्गुन अमावस्या पर पितृ शांति के लिए प्रातःकाल उठ जाएं और किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान कर खुद को पवित्र करें। अगर नदी में स्नान नहीं कर सकते है तो आप घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर नहा सकते हैं। इसके बाद सूर्य देव को प्रणाम करे और अर्घ्य दें। इसके पश्चात आप भगवान गणेश का ध्यान करें और गणेश जी के मंत्रों का जाप करें। विष्णु जी और शिवजी भगवान की विधि विधान पूजा-अर्चना करें और व्रत का संकल्प लें। घर में गोमूत्र का छिड़काव जरूर करें और पूर्वजों के लिए तर्पण करें।




ब्राह्मण को करें दान
हिन्दू धर्म में दान का खास महत्व है। अमावस के तर्पण के बाद इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देना श्रेष्ठ होता है। दान में आप सीधा (आटा, चावल, दाल, मसाले, तेल, सब्जियां) निकालें, अपनी सामर्थ में अनुसार कपड़े, बर्तन का दान भी ब्राम्हण को कर सकते हैं।अमावस के दिन शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं फिर पूर्वजों का स्मरण करते हुए पेड़ की सात बार परिक्रमा करें। इससे पत्रों को मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख समृद्धि आती है।</description><guid>8238</guid><pubDate>10-Feb-2026 8:41:58 am</pubDate></item><item><title>300 साल बाद महाशिवरात्रि पर बन रहा है खास संयोग, आपकी हर इच्छा हो सकती है पूरी</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8237</link><description>इस बार महाशिवरात्रि 15 फरवरी दिन रविवार को पड़ रही है. महाशिवरात्रि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. इस दिन भगवान महादेव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, जिसे शिव भक्त हर साल बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं. खास बात यह है कि इस बार महाशिवरात्रि पर 300 साल बाद 8 योग का शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और बढ़ गया है.




ज्योतिषियों के अनुसार, करीब 300 साल बाद महाशिवरात्रि पर 8 योग का शुभ योग बन रहा है. जिसमें 15 फरवरी को सूर्य, बुध और शुक्र का त्रिग्रही योग बन रहा है. यह मानव जीवन में विशेष फल देगा. इसके अलावा इस दिन श्रवण नक्षत्र भी है जो भगवान शिव को अति प्रिय है इसके अलावा व्यतिपात, वरियान, ध्रुव और राज योग का भी महासंयोग है, जो इस दिन को और भी खास बनाता है. इस दिन भगवान शिव जी की विधिवत पूजा कर अभिषेक करना चाहिए. इससे परिवार में सुख समृद्धि का आगमन होगा.</description><guid>8237</guid><pubDate>10-Feb-2026 8:40:27 am</pubDate></item><item><title>महाशिवरात्रि 2026: जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त, व्रत विधि और पारण का सही समय</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8200</link><description>Mahashivratri 2026: शिव भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का दिन बहुत खास होता है. पूरे साल भगवान शिव के भक्त इस पर्व का इंतजार करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा और व्रत करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. भोलेनाथ के आशीर्वाद से शिव भक्त का जीवन सुखी और समृद्ध रहता है.


महाशिवरात्रि हर साल फाल्गुन महीने में मनाई जाती है. इस बार महाशिवरात्रि 15 फरवरी को है.




महाशिवरात्रि की तारीख और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी को शाम 5 बजकर 4 मिनट से शुरू होगी. चतुर्दशी तिथि 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 34 मिनट पर समाप्त होगी. उदय तिथि के अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत 15 फरवरी को रखा जाएगा.


इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाएगी. बता दें कि हर महीने मासिक शिवरात्रि आती है. इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ व्रत रखने की परंपरा है. फाल्गुन महीने में पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है.
</description><guid>8200</guid><pubDate>27-Jan-2026 10:41:43 am</pubDate></item></channel></rss>