<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>संस्कृति - Didi News Feed</title><link>https://didinews.co.in/</link><description>Didi News Feed Description</description><item><title>पंचमहायज्ञ का महत्व : क्यों हर गृहस्थ के लिए जरूरी है प्रतिदिन इन पांच कर्तव्यों का पालन </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8672</link><description>सनातन धर्म में गृहस्थ आश्रम को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण बताएं है, क्योंकि यही वह अवस्था है जहां व्यक्ति अपने परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है. इन्हीं कर्तव्यों में सबसे प्रमुख हैं पंचमहायज्ञ, जिन्हें हर गृहस्थ को अपनी क्षमता के अनुसार प्रति दिन करना चाहिए. धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचमहायज्ञ नित्य कर्म में आते हैं, यानी इन्हें रोज करना चाहिए. ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और समाज को समृद्ध बनाने का मार्ग हैं. मनुष्य इस ब्रह्मांड में अकेला नहीं है. उसका अस्तित्व प्रकृति, समाज और अन्य जीवों पर निर्भर है. ऐसे में इन यज्ञके माध्यम से कृतज्ञता और जिम्मेदारी निभाना ही सच्चा धर्म माना गया है.




1.ब्रह्मयज्ञ
इसका अर्थ है ज्ञान प्राप्त करना और उसे आगे बढ़ाना. हर रोज धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, ध्यान और ईश्वर का स्मरण करना इसी का हिस्सा है. इससे व्यक्ति में नैतिकता और सही सोच विकसित होती है.


2.पितृयज्ञ
यह यज्ञ हमारे माता-पिता, गुरुजनों और पूर्वजों के प्रति सम्मान और सेवा से जुड़ा है. उनकीदेख भाल करना और दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध या तर्पण करना इसमें शामिल है.


3.देवयज्ञ
इसमें हम प्रकृति और देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. हवन, पूजा, संध्या वंदन और प्रार्थना इसके प्रमुख अंग है.


4.भूतयज्ञ
यह सभी जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को दर्शाता है. पक्षियों को दाना डाना, पशुओं की सेवा करना और पौधों की देखभाल करना इसमें आता है.


5.मनुष्ययज्ञ
इसे अतिथियज्ञ भी कहा जाता है. इसका अर्थ है अतिथियों का सत्कार करना और जरूरतमंदों की सहायता करना. जैसे भूखों को खाना देना और गरीबों की मदद करना.</description><guid>8672</guid><pubDate>03-Jul-2026 12:49:19 pm</pubDate></item><item><title>साल में एक बार मिलता है मौका, गुरु पूर्णिमा पर करें ये उपाय, कुंडली का कमजोर बृहस्पति भी हो जाएगा मजबूत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8671</link><description> देवताओं के गुरु बृहस्पति को सबसे शुभ और प्रभावशाली ग्रहों में गिना जाता है. यह ग्रह ज्ञान, शिक्षा, संतान, विवाह, भाग्य और करियर का कारक है. जिस व्यक्ति की कुंडली में गुरु मजबूत होता है. उसे जीवन में सफलता, सम्मान और धन की कभी कमी नहीं रहती, लेकिन जब यही गुरु ग्रह कमजोर हो जाता है, तो जीवन में परेशानियों का दौर शुरू होने लगता है. एक खास अवसर साल में सिर्फ एक बार आता है. गुरु पूर्णिमा, जब आप अपने गुरु और बृहस्पति ग्रह को मजबूत कर सकते हैं. साल 2026 में गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी. यह दिन आपके भाग्य को बदलने का सुहनरा मौका लेकर आता है.




कुंडली का कमजोर गुरु ये 5 संके देते हैं
यदि आपकी शिक्षा में बार-बार रुकावट आ रही है या मन चाहा परिणाम नहीं मिल रहा, तो यह कमजोर गुरु का संकेत हो सकता है.
इसके अलावा लीवर संबंधी समस्याएं, पीलिया, मोटापा या थायराइड जैसी दिक्कतें भी गुरु के अशुभ प्रभाव को दर्शाती हैं.
निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है और सही-गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है.
धीरे-धीरे व्यक्ति धार्मिक कार्यों से दूर होने लगता है, पूजा-पाठ में मन नहीं लगता और अहंकार बढ़ने लगता है.
बाल झड़ना, गले और फेफड़ों की समस्या भी इसके संकेत माने जाते हैं.
गुरु पूर्णिमा पर करें ये उपाय
गुरु पूर्णिमा का दिन गुरु को प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम समय आता है. इस दिन सुबह स्नान करके अपने गुरु का ध्यान करें. यदि संभव हो तो उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें. अगर गुरु दूर हों, तो फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से भी सम्मान व्यक्त करें.


पीले वस्त्र पहनना, पीली वस्तुओं जैसे चना दाल, हल्दी, केले का दान करना बेहद शुभ माना जाता है. इस दिन ओम बृं बृहस्पतये नमः मंत्र का जाप करने से गुरु ग्रह मजबूत होता है. इसके अलावा गरीबों को भोजन कराना, ब्राह्मणों को दान देना और धार्मिक कार्यों में भाग लेना भी विशेष फलदायी होता है.


क्यों खास है यह दिन?
गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्म सुधार और भाग्य परिवर्तन का अवसर है. साल में एक बार आने वाला यह दिन आपको अपने गुरु के प्रति आभार जताने और जीवन को सही दिशा देने का मौका देता है.</description><guid>8671</guid><pubDate>03-Jul-2026 12:47:58 pm</pubDate></item><item><title>संकष्टी चतुर्थी आज : गणपति की पूजा से दूर होंगे संकट, विवाह, नौकरी में सफलता के उपाय </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8670</link><description>आज आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है, जो भगवान गणेश के विशेष स्व रूप की आराधना का पावन अवसर है. इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं हर दिशा में सफलता व समृद्धि प्राप्त होती है.




चतुर्थी तिथि का शुभारंभ
पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि का शुभारंभ 3 जुलाई को सुबह 11:21 बजे हुआ और इसका समापन 4 जुलाई को दोपहर 12:40 बजे होगा. उदया तिथि के अनुसार आज यानी शुक्रवार को यह व्रत रखा जा रहा है. इस दिन भगवान गणपति की पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है. जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है.


इस दिन व्रत करने का लाभ
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, संकष्टी चतुर्थी का व्रत आर्थिक परेशानियों को दूर करता है.
गणेश जी की कृपा से करियर, कारोबार में सफलता दिलाता है.
इस दिन व्रत करने से स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है.
इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति भी संभव मानी जाती है.
आज के दिन करेंगे सरल उपाय
यदि आप विद्या और बुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, तो आज के दिन पीले वस्त्र धारण कर भगवान गणेश की पूजा करें और ओम गं गणपतये नमः मंत्र का जप करें. साथ ही पीले धागे को अर्पित कर उसे गुरु या माता-पिता से बंधवाना शुभ माना जाता है.
संतान सुख की कामना रखने वाले भक्त भगवान गणेश को फलों की माला अर्पित कर ओम उमा पुत्राय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. इसके बाद फलों को बच्चों में बांटना पुण्य कारी माना गया है.
विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए गणपति कासिंदूर से श्रृंगार कर पीले वस्त्र, फूल और मोदक अर्पित करें. ओम विघ्नहर्त्रे नमः मंत्र का जाप करें.
मकान बनाने की इच्छा रखने वाले लाल फूल, लाल वस्त्र और तांबे का सिक्का अर्पित कर विशेष मंत्र का जाप करें.
नौकरी की तलाश कर रहे लोगों के लिए आज का दिन बेहद खास है. अपनी उम्र के अनुसार लड्डू चढ़ाकर ओम नमो भगवते लम्बोदराय मंत्र का उच्चारण करें. प्रसाद का वितरण करें.</description><guid>8670</guid><pubDate>03-Jul-2026 12:46:28 pm</pubDate></item><item><title>ओम का उच्चारण बना रहा टेंशन फ्री, जानिए 10 बीमारियों पर कैसे करता है असरदार काम </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8669</link><description> आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, थकान और बीमारियां दिन चर्या का हिस्सा बनती जा रही है. ऐसे में अगर एक साधारण सा मंत्र आपकी सेहत और मन दोनों को संतुलित करके रख दे, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है? हिंदू धर्म में ओम को महामंत्र कहा गया है, लेकिन अब यह सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं. वैज्ञानिक शोध भी मानते हैं कि ओम के उच्चारण से निकलने वाली ध्वनि तरंगें शरीर और दीमाग पर गराह सकारात्मक असर डालती हैं. नियमित जप करने से मानसिक शांति के साथ-साथ कई शारीरिक बीमारियों में भी रातह मिलती है.




थायराइड के लिए लाभकारी
आज के समय में अधिकतर महिलाओं को यह बीमारी है. इस में ओम का उच्चारण करते समय गले में कंपन पैदा होती है, जो थाय राइड ग्रंथी को सक्रिय करने में मदद करती है.


तनाव और एंग्जायटी से राहत भी
भाग दौड़ बड़ी जिंदगी में तनाव आम बात हो चुकी है. यह मंत्र दीमाग को शांत करता है. जिससे स्ट्रेस और चिंता धीरे-धीरे कम होने लगती है.


हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता
ये मंत्र किसी रामबाण उपाय से काम नहीं है. ओमका नियमित जाप रक्त प्रवाह को संतुलित करता है, जिससे BP नियंत्रित रहने में मदद मिलती है.


दिल को स्वस्थ रखता है
ध्वनि कंपन हृदय की कार्य प्रणाली को संतुलित कर हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाती है. जिस दिल और ज्यादा सुरक्षित हो जाता है.


स्मरण शक्ति बढ़ाता है
बच्चों और बड़ों दोनों के लिए यह फायदे मंद है, इससे एकाग्रता और याददाश्त मजबूत होती है. इसके नियमित उच्चारण से बच्चों की याददाश्त बढ़ती है.


नींद की समस्या दूर करे
अधिकतर लोग अनिद्रा से जूझ रहे लोगों के लिए यह एक प्राकृतिक उपाय है, जिससे गहरी और सुकून भरी नींद आती है.


थकान और कमजोरी दूर
दिनभर की थकान के बाद ओम का जप शरीर में नई ऊर्जा भर देता है. इससे कम से लूटने के बाद भी किया जा सकता है.


पाचन तंत्र को मजबूत करता
यह शरीर के अंदरूनी सिस्टम को संतुलित कर पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है. जिस व्यक्ति काम बीमार होता है.


मानसिक शांति और पॉजिटिविटी
नियमित उच्चारण से मन में सकारात्मक विचार आते हैं और नकारात्मकता दूर होती है. दिनभर नए-नए पॉजिटिव आइडिया भी आते है.


सांस संबंधी समस्याओं में राहत
ओम का उच्चाणर सांसों को नियंत्रित करता है, जिससे फेफड़े मजबूत होते है. खासकर ठंड बरसात के दिनों में तो इसका नियमित अभ्यास बहुत ही लाभदायक है.


कैसे करें सही उच्चारण?
सुबह या शाम शांत जगह पर बैठकर गहरी सांस लें. लंबी ध्वनि के साथ ओऽऽम का उच्चारण करें. रोज 1015 मिनट का अभ्यास भी बड़ा बदलाव ला सकता है.</description><guid>8669</guid><pubDate>03-Jul-2026 12:44:36 pm</pubDate></item><item><title>वास्तु टिप्स : क्या स्थिर नहीं है आपकी आर्थिक स्थिती, आज ही घर में बदलें ये चीजें, </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8656</link><description>हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी मेहनत का पूरा फल मिले. परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे. लेकिन कई बार अथक परिश्रम के बावजूद धन टिक नहीं पाता. आर्थिक परेशानियां बनी रहती है. वास्तु शास्त्र के अनुसार इसके पीछे घर में मौजूद ऊर्जा असंतुलन भी एक कारण बन सकता है. मान्यता है कि घर में किए गए कुछ छोटे-छोटे बदलाव सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकते हैं. आर्थिक स्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं.




दिशा का महत्व
वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को धन के देवता कुबेर की दिशा माना गया है. इसलिए इस दिशा को हमेशा साफ और अव्यवस्था से मुक्त रखने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि उत्तर दिशा में भारी सामान या कबाड़ रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बाधित होता है. वहीं, दक्षिण-पश्चिम दिशा को धन संरक्षण और संचय के लिए शुभ कहते हैं. इस स्थान पर तिजोरी या महत्वपूर्ण दस्तावेज रखने से आर्थिक स्थिरता बनी है. दक्षिण-पूर्व दिशा, जिसे अग्नि कोण कहते हैं. इदस अग्नि कोण में धन आकर्षित करने वाले पौधे लगाने से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है. साथ ही घर को हवादार और खुला रखने से वाता वरण में ताजगी बनी रहती है. जो मानसिक और आध्यात्मिक रूप से लाभ कारी मानी जाती है.


इन छोटी बातों को न करें नजरअंदाज
वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, घर में टपकता हुआ नल आर्थिक नुकसान का संकेत हैं, इसलिए यदि कही पानी रिस रहा हो तो उसे तुरंत ठीक करवाना चाहिए. इसके अलावा, घर में रखी टूटी-फूटी, बेकार या जंग लगी वस्तुएं नकारात्मकता बढ़ाने वाली कहलाती हैं. इन्हें समय-समय पर हटाना बहुत जरूरी है.


भूलकर भी न करें ये गलतियां
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा को अत्यंत पवित्र माना गया है. इस स्थान पर भारी फर्नीचर या स्टोर रूम बनाने से बचने की सलाह दी जाती है. वहीं, घर का मुख्य द्वार साफ और रोशनी से युक्त होना चाहिए. मान्यता है कि इससे शुभ ऊर्जा का प्रवेश होता है. इसके अलावा, उत्तर दिशा की दीवार पर ऐसा दर्पण लगाने का भी उल्लेख मिलता है. जिसमें तिजोरी या धन रखने का स्थान दिखाई देता हो. वास्तु मान्यताओं के अनुसार यह उपाय समृद्धि और आर्थिक अवसरों को बढ़ाने वाला है.


घर में ये चीजें लाने से बढ़ी है सुख-समृद्धि
वास्तु शास्त्र में कुछ ऐसी वस्तुओं का उल्लेख किया है. जिन्हें घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा, आर्थिक उन्नति और सुख में वृद्धि होने की मान्यता है. वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार धन नहीं टिकता है तो पूजा घर में मां लक्ष्मी और कुबेर की प्रतिमा स्थापित कर साथ ही नियमित पूजा करनी चाहिए. वहीं करियर, नौकरी या व्यवसाय में बार-बार आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए घर की पूर्व या उत्तर दिशा में बांसुरी रखना शुभ होगा. आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर दक्षिणावर्ती शंख रखा चहिए और नियमित रूप से शंख बचाकर वातावरण को सकारात्मक करे. इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. इसके अलावा मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा कक्ष में एकाक्षी नारियल रखने का भी महत्व बताया है. वहीं परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य और सुख-शांति के लिए ड्राइंग रूम में धातु से निर्मित मछली और कछुआ रखना लाभ कारी माना जाता है</description><guid>8656</guid><pubDate>23-Jun-2026 11:20:48 am</pubDate></item><item><title>यह 10 फूल भगवान शिव को अति प्रिय, हर पुष्प का अलग महत्व </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8655</link><description>भगवान शिव को प्रसन्न करना जितना सरल है, उतना ही रहस्यमयी भी है. भोलेनाथ सच्ची श्रद्धा से की गई छोटी-सी पूजा से भी तुरंत प्रसन्न हो जाते है लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिव पूजा में चढ़ाए जाने वाले फूल केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आपके जीवन की दिशा बदलने वाली शक्तियां भी माने जाते हैं ? हर फूल का अपना अलग महत्व और फल बताया गया है. कोई धन दिलाता है,कोई संतान सुख देता है तो कोई पापों से मुक्ति दिलाने वाला है. ज्योतिष और पुराणों के अनुसार यदि सही मनोकामना के साथ सही फूल अर्पित किया जाए, तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. यही कारण है कि शिव पूजा में फूलों का चयन बेहद सोच-समझकर करने की सलाह दी जाती है.




1 धतूरा: संतान सुख का सबसे बड़ा उपाय
भगवान शिव को धतूरा अत्यंत प्रिय है. मान्यता है कि इसे अर्पित करने से दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और पारिवारिक जीवन में खुशहाली आती है.


2 कनेर: धन प्राप्ति का रहस्य
कनेर का फूल शिवजी को चढ़ाने से आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और मनचाहा धन लाभ मिलता है.


3 बेला: मनचाहा जीवनसाथी
बेला का फूल अर्पित करने से अविवाहित लोगों को सुंदर और योग्य जीवन साथी मिलने के योग बनते हैं.


4 शमी: शनि दोष से मुक्ति
शमी के फूल चढ़ाने से घर में सुख-समृद्धि आती है और शनि से जुड़े दोष दूर होते हैं.


5 हरसिंगार: सुख-वैभव में वृद्धि
हरसिंगार के फूल से पूजा करने पर जीवन में सुख और वैभव बढ़ता है.


6 अलसी: पापों से मुक्ति
अलसी का फूल शिवलिंग पर अर्पित करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिलती है.


7 मदार (आंकड़ा): मोक्ष का मार्ग
मदार का फूल शिव को अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.


8 अगस्त्य: यश और सम्मान
अगस्त्य पुष्प से पूजा करने पर समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ती है.


9 चमेली: सकारात्मक ऊर्जा
चमेली का फूल जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है.


10 वर्जित फूल: केतकी से करें परहेज
शिव पूजा में केतकी का फूल कभी नहीं चढ़ाना चाहिए. पौराणिक मान्यता के अनुसार इसे भगवान शिव ने अपनी पूजा से वर्जित किया है.</description><guid>8655</guid><pubDate>23-Jun-2026 11:18:28 am</pubDate></item><item><title>कब है वट पूर्णिमा : इस दिन का सुहागिनों के लिए खास महत्व, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8645</link><description>हिंदू संस्कृति में सुहागिन महिलाओं के लिए वट पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है. इस दिन महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा को स्मरण करते हुए वट वृक्ष की पूजा करती हैं.




कब है वट पूर्णिमा
हिंदू पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि को वट पूर्णिमा मनाई जाती है. यह व्रत सोमवार, 29 जून को रखा जाएगा. पूर्णिमा तिथि की शुरु आत 29 जून को सुबह 3:07 बजे होगी और समापन 30 जून को सुबह 5:27 बजे होगा. पूजा का सबसे शुभ समय सुबह 6:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक रहेगा.


पूजा की तैयारी और आवश्यक सामग्री
व्रत करने वाली महिलाएं पूजा से पहले हल्दी कुमकुम, अक्षत, फूल, सफेद सूत का धागा, पांच प्रकार के फल, पान-सुपारी, नारियल, गुड, धूप, दीप और कपूर की व्यवस्था करती हैं. इसके अलावा वाण देने के लिए बांस की सुपारी में चने और फल रखे जाते हैं.


पूजा विधि क्या है?
सुबह स्नान के बाद महिलाएं पारंपरिक साड़ी, हरी चूड़ियां पहनकर तैयार होती हैं. इसके बाद वट वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में हळद-कुंकू, अक्षत और फूल अर्पित किए जाते हैं. सावित्री-सत्यवान का स्मरण करते हुए फल और पान-सुपारी चढ़ाई जाती है. इसके बाद वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए सफेद धागा लपेटा जाता है. शास्त्रों के अनुसार कम से कम 7 या 108 फेरे लगाने का विधान है. अंत में आरती कर व्रत पूर्ण किया जाता है और अन्य सुहागिन महिलाओं को वाण देकर सौभाग्य का आशीर्वाद दिया जाता है.


वट पूर्णिमा की प्रार्थना
इस दिन महिलाएं सावित्री देवी से प्रार्थना करती हैं. हे देवी! मुझे अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि प्रदान करें. यदि संस्कृत श्लोक न आता हो तो सरल भाषा में भी यही भावना व्यक्त की जा सकती है. यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को भी मजबूत करता है.</description><guid>8645</guid><pubDate>11-Jun-2026 10:42:20 am</pubDate></item><item><title>अधिक मास के पूरे 1 महीने का फल लेने का अंतिम अवसर, शेष 5 दिनों में कर लें यह काम </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8644</link><description>अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास अब अपने अंतिम चरण में है. इसके समाप्त होने में केवल कुछ ही दिन शेष रह गए हैं. धार्मिक मान्यता है, ये महीना स्वयं भगवान नारायण को समर्पित होता है. इसलिए इस दौरान किया हर जप, तप, दान और व्रत अक्षय फल देने वाला होता है.




कब से शुरू हुआ और कब होगा समाप्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, अधिकमास का आरंभ इस वर्ष 17 मई से हुआ थाl इसका समापन 15 जून को होने जा रहा है. यानी अब केवल अंतिम कुछ दिन ही शेष हैं, जिन्हें शास्त्रों में सबसे अधिक फल दायी माना गया है.


अब क्यों है यह समय सबसे महत्वपूर्ण
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार,अधिक मास के अंतिम 5 दिन पूरे महीने की साधना का निष्कर्ष होते हैं. यदि कोई व्यक्ति पूरे महीने नियमों का पालन नहीं कर पाया, तो इन आखिरी दिनों में किए गए उपाय भी उतना ही पुण्य दे सकते है. इसलिए यह समय अंतिम अवसर माना जाता है.


तुलसी की 108 परिक्रमा से पापों का नाश  इन दिनों में रोजाना तुलसी की 108 परिक्रमा करने से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है. इसे लक्ष्मी कृपा प्राप्त करने का सरल उपाय भी माना गया है.
गौसेवा और दीपदान का विशेष महत्व  गौमाता को 11 लोई खिलाने से पितृदोष दूर होता है और ग्रह मजबूत होते हैं. वहीं हर शाम 5 दीपक जलाने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और बाधाएं दूर होती हैं.
विष्णु-नरसिंह भक्ति से मिलेगा संपूर्ण फल  भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित कर ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने और भगवान नरसिंह की पूजा करने से भय, शत्रु और कष्ट समाप्त होते हैं. इन अंतिम दिनों में की गई सच्ची भक्ति कल्याणकारी झोली भरने जैसी मानी जाती है. जो जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकती है.</description><guid>8644</guid><pubDate>11-Jun-2026 10:39:48 am</pubDate></item><item><title>10 या 11 जून, कब रखा जाएगा परमा एकादशी व्रत? जानें सही दिन और शुभ मुहूर्त</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8640</link><description> ज्येष्ठ अधिकमास की विशेष एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्य देने वाला है, लेकिन इस बार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी को लेकर लोगों में तारीख का भ्रम बना हुआ है. दरअसल, अधिक मास में पड़ने वाली यह एकादशी बेहद दुर्लभ मानी जाती है, जो लगभग हर तीन साल में एक बार ही आती है. यही कारण है कि इसे सभी 24 एकादशियों में सबसे विशेष और फल दायी बताया गया है.


कब रखें व्रत?
द्रिक पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 10 जून को रात 12:58 बजे शुरू होकर 11 जून को रात 10:37 बजे समाप्त होगी. उदया तिथि के आधार पर परमा एकादशी का व्रत 11 जून, गुरुवार को ही रखा जाएगा. इसलिए भक्तों को किसी भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है और 11 जून को व्रत करना ही शास्त्र सम्मत माना जाएगा.


शुभ मुहूर्त और पारण का समय
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:02 से 04:42 तक रहेगा, जबकि पूजा के लिए उत्तम मुहूर्त 05:23 से 07:07 बजे तक है. अभिजीत मुहूर्त 11:53 से 12:49 बजे तक रहेगा. व्रत का पारण 12 जून को सुबह 05:23 से 08:10 बजे के बीच करना श्रेष्ठ होने वाला है.


क्यों खास है परमा एकादशी?
परमा एकादशी को सर्वोच्च एकादशी कहा गया है. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. जीवन के सभी पापों से मुक्ति मिलती है. अधिक मास में आने के कारण इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है.


पौराणिक कथा देती है बड़ा संदेश
पुराणों के अनुसार, धन के देवता कुबेर ने इसी व्रत के प्रभाव से धनाध्यक्ष का पद प्राप्त किया था, वहीं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी परमा एकादशी का व्रत रखकर अपना खोया हुआ राज्य और परिवार वापस पाया था. यह कथा बताती है कि यह व्रत जीवन में खोई हुई खुशियों को वापस लाने की शक्ति रखता है.


व्रत रखने के लाभ
परमा एकादशी का व्रत मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है. साथ ही यह व्रत आर्थिक समस्याओं को दूर करने और जीवन में सुख लाने वाला है. इसलिए इस विशेष संयोग में श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखना अत्यंत लाभकारी बताया गया है.</description><guid>8640</guid><pubDate>10-Jun-2026 10:40:42 am</pubDate></item><item><title>राधा रानी के 32 नामों का चमत्कार, जप करने से दुख-दरिद्रता होगी दूर </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8639</link><description>हिंदू धर्म में भक्ति और साधना का विशेष महत्व है और राधा रानी की उपासना से बड़े-बड़े काम बन जाते हैं. शास्त्रों में वर्णित राधा रानी के 32 दिव्य नामों का नियमित और श्रद्धा पूर्वक जाप करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है. इन नामों में अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति है, जो व्यक्ति के मन से नकारात्मकता दूर कर आत्म विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है.




कठिन परिस्थितियां भी आसान हो जाती है
भक्तों का विश्वास है कि इन नामों का सच्चे भाव से स्मरण करने पर कठिन से कठिन परिस्थितियां भी आसान होने लगती है. सोया हुआ भाग्य जागृत हो सकता है. राधा रानी के ये नाम उनके प्रेम, करुणा, सौंदर्य और दिव्यता के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाते हैं.


राधा रानी के 32 नाम
मृदुल भाषिणी, सौंदर्य राशिणी, परम् पुनीता, नित्य नवनीता, रास विलासिनी, दिव्य सुवासिनी, नवल किशोरी, अति ही भोरी, कंचनवर्णी, नित्य सुखकरणी, सुभग भामिनी, जगत स्वामिनी, कृष्ण आनन्दिनी, आनंद कन्दिनी, प्रेम मूर्ति, रस आपूर्ति, नवल ब्रजेश्वरी, नित्य रासेश्वरी, कोमल अंगिनी, कृष्ण संगिनी, कृपा वर्षिणी, परम् हर्षिणी, सिंधु स्वरूपा, परम् अनूपा, परम् हितकारी, कृष्ण सुखकारी, निकुंज स्वामिनी, नवल भामिनी, रास रासेश्वरी, स्वयं परमेश्वरी, सकल गुणीता, रसिकिनी पुनीता.


राधा नाम जप करने का नियम
जाप के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय सबसे शुभ माना गया है. साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठना चाहिए.
राधा-कृष्ण की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाकर और तुलसी की माला से शुद्ध उच्चारण के साथ नामों का जाप करना विशेष फल दायी बताया गया है.
यह साधना पूरी तरह आस्था और विश्वास पर आधारित है. लेकिन भक्ति परंपरा में इसे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला एक प्रभावशाली माध्यम माना जाता है.</description><guid>8639</guid><pubDate>10-Jun-2026 10:34:23 am</pubDate></item><item><title>अधिकमास में सोमवती अमावस्या पर बन रहा है दुर्लभ संयोग, पीपल और तुलसी की 108 परिक्रमा से मिलेगा अक्षय पुण्य </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8631</link><description>अधिकमास में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या इस बार बेहद खास मानी जा रही है. 14 जून दोपहर 12:19 बजे से शुरू होकर 15 जून सुबह 8:23 बजे तक रहने वाली यह तिथि उदयातिथि के अनुसार 15 जून को मनाई जाएगी. सोमवार और अमावस्या का यह संयोग धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है, जो साधारण अमावस्या से कई गुना अधिक फलदायी बताया गया है.




क्यों खास है यह अमावस्या?
इस दिन व्रत, स्नान और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं, वहीं पितृ दोष निवारण के लिए यह दिन सर्वोत्तम है. पवित्र नदियों में स्नान या घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी फल दायी होता है.


पीपल और तुलसी की 108 परिक्रमा
इस दिन पीपल और तुलसी की पूजा का विशेष महत्व है. पीपल को त्रिदेव का प्रतीक माना गया है, जबकि तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है. 108 परिक्रमा करने का अर्थ है पूर्णता, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार. मान्यता है कि इससे जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती है.


पितृ तर्पण से मिलेगा आशीर्वाद
गरुड़ पुराण के अनुसार सोमवती अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष समाप्त होता है. तिल और जल से दक्षिण दिशा में तर्पण करना चाहिए. घर या मंदिर में दीपक जलाकर ओम नमः शिवाय का जाप करने से भी विशेष फल मिलता है.


पीपल में पितरों का वास
ऐसी मान्यता है कि अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में पितरों का वास होता है. दूध और मीठा जल चढ़ाने से लक्ष्मी कृपा प्राप्त होती है. पीपल के नीचे दीपक जलाना और परिक्रमा करना जीवन की बाधाएं दूर करता है.


दान और उपाय से बदलेगा भाग्य
इस दिन अन्न, तिल, दूध, फल और आंवले का दान विशेष फल दायी माना है. गाय को रोटी खिलाना, मछलियों को आटे की गोलियां देना और चींटियों को शक्कर मिला आटा खिलाने जैसे उपाय जीवन की परेशानियों को कम करते हैं. शाम को ईशान कोण में दीपक जलाने से घर में सुख-समृद्धि आती है.</description><guid>8631</guid><pubDate>09-Jun-2026 11:58:22 am</pubDate></item><item><title>शुक्र और मंगल आने वाले हैं एक साथ, लाभ में रहेंगी 4 राशियां, कुछ को सावधानी की जरूरत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8622</link><description> 21 जून को मंगल ग्रह अपनी राशि बदलकर शुक्र की राशि वृषभ में प्रवेश करने वाले हैं. ऊर्जा और साहस के प्रतीक मंगल जब सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य के कारक शुक्र के साथ युति बनाएंगे तो इसका असर सभी राशियों पर अलग-अलग रूप में देखने को मिलता है. यह संयोग जहां कुछ लोगों के लिए चुनौतियां लेकर आ सकता है. वहीं कुछ राशियों के लिए यह समय वरदान साबित हो ने वाका है.




मंगल और शुक्र का स्वभाव
मंगल को अग्नि तत्व का ग्रह माना जाता है, जो साहस, पराक्रम, भूमि, सेना और जोखिम लेने की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं शुक्र भौतिक सुख, प्रेम, सौंदर्य और वैभव के कारक है. इन दोनों ग्रहों की युति व्यक्ति के जीवन में ऊर्जा और आकर्षण का अनोखा संतुलन बनाती है. हालांकि इस दौरान आक्रामकता और जल्द बाजी से बचना बेहद जरूरी होगा. वरना रिश्तों और वित्तीय मामलों में परेशानी आ सकती है.


इन 4 राशियों के लिए शुभ संकेत आने वाले हैं
मेष राशि  इस राशि के जातकों के लिए यह समय आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है. आय के नए स्रोत बनेंगे और रुके हुए काम पूरे होने की संभावना है. परिवार का सहयोग भी मिलेगा.
वृषभ राशि  मंगल आपकी ही राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे आत्मविश्वास में जबरदस्त वृद्धि होगी. नए काम शुरू करने का अवसर मिलेगा और व्यापार में लाभ के संकेत हैं. हालांकि गुस्से पर नियंत्रण रखना जरूरी होगा.
कर्क राशि  इस राशि के लोगों को करियर और व्यवसाय में नए अवसर मिल सकते हैं. मित्रों और वरिष्ठों का सहयोग मिलेगा, जिससे आय में वृद्धि के योग बनेंगे.
सिंह राशि  करियर के लिहाज से यह समय बेहतरीन रहेगा. नौकरी में पद और जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं. मेहनत का पूरा फल मिलेगा. अधिकारियों का सहयोग भी मिलेगा.
सावधानी भी जरूरी होगी
यह ग्रह योग लाभ कारी है, लेकिन रिश्तों में अहंकार और आक्रामकता से बचना बेहद जरूरी है. साथ ही बिना सोचे-समझे खर्च करने से बचें और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, खासकर हार्मोनल और तनाव से जुड़ी समस्याओं पर इसे ध्यान देने की जरूरत है.</description><guid>8622</guid><pubDate>07-Jun-2026 10:08:46 am</pubDate></item><item><title>Bhanu Saptami 2026 : 12 साल बाद बना दुर्लभ संयोग, भानु सप्तमी पर सूर्य उपासना से मिलेगा धन, स्वास्थ्य और सौभाग्य</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8616</link><description>Bhanu Saptami 2026 : हिंदू धर्म में कई ऐसे व्रत और पर्व होते हैं जिनकी जानकारी सीमित लोगों तक रहती है। लेकिन उनका आध्यात्मिक प्रभाव बेहद गहरा माना गया है। ऐसा ही एक विशेष व्रत है भानु सप्तमी, जो इस बार 7 जून, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन की खास बात यह है कि यह संयोग अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) में बन रहा है, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ गया है।




पंचांग के अनुसार, जब भी सप्तमी तिथि और रविवार एक साथ आते हैं, तब भानु सप्तमी का व्रत रखकर सूर्य देव की उपासना की जाती है। इससे पहले ऐसा संयोग वर्ष 2014 में अधिकमास के दौरान बना था। लगभग 12 साल बाद फिर से यह दुर्लभ योग बना है, जिसे ज्योतिष और धर्म दोनों दृष्टियों से अत्यंत शुभ माना जा रहा है।


सूर्य उपासना का खास दिन
धार्मिक कथाओं के अनुसार, सूर्यदेव अपने स्वर्ण रथ पर सवार होकर सात घोड़ों के साथ पृथ्वी पर आते हैं जो उनकी सात किरणों का प्रतीक हैं। यह दिन नई ऊर्जा, जीवन और सकारात्मकता का संकेत माना जाता है। बता दें कि सूर्य का एक नाम भानु भी है। भानु सप्तमी पूरी तरह से सूर्य देव को समर्पित होती है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की विधिपूर्वक पूजा, अर्घ्य और व्रत करने से जीवन के कष्ट दूर होते है। श्रद्धालु प्रातःकाल सूर्य को जल अर्पित करते है और आदित्य हृदय स्तोत्र व अन्य सूर्य मंत्रों का जाप करते है।


ज्योतिषीय दृष्टि से महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में सूर्य कमजोर स्थिति में होता है। उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी है। सूर्य को आत्मा, स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और सफलता का कारक ग्रह माना गया है। इस दिन की गई पूजा से व्यक्ति को मान-सम्मान, ऊर्जा और रोगों से राहत मिलती है।


भानु सप्तमी का व्रत करने के प्रमुख लाभ
सूर्य कृपा से स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति करने के लिए जरूरी है।
आर्थिक समस्याओं में राहत और समृद्धि का सूर्यदेव से आर्शीवादमिलता है।
मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि के साथ करियर में तरक्की मिलती है।
अविवाहित महिलाओं को योग्य वर मिलने का आशीर्वाद
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भानु सप्तमी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक अवसर है। इस बार बना यह दुर्लभ संयोग श्रद्धालुओं के लिए विशेष फल दयी माना जा रहा है।</description><guid>8616</guid><pubDate>06-Jun-2026 11:57:08 am</pubDate></item><item><title>Mrityu Panchak : मृत्यु पंचक अशुभ दिन! जानिए कब तक रहेगा असर और किन कार्यों से करना होगा परहेज</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8613</link><description>किसी भी शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए सही समय और मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। हिंदू धर्म में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से पहले पंचांग और नक्षत्रों पर विचार किय जाता है। ज्योतिष शास्त्र में कुछ समय ऐसे भी बताए गए है जिन्हें संवेदनशील और सावधानी बरतने योग्य माना जाता है। इन्हीं में से एक है पंचक काल, जो जून में एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। इस बार यह मृत्यु पंचक के रूप में प्रभाव दिखाएगा। जिसे अत्यंत अशुभ बताया जाता है।




कब से कब तक रहेगा मृत्यु पंचक का असर
ज्योतिष गणना के अनुसार 6 जून, शनिवार को शाम 7 बजकर 3 मिनट से पंचक की शुरुआत होगी। शनिवार से शुरू होने के कारण इसे मृत्यु पंचक कहा जाता है । यह पंचक 11 जून को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर समाप्त होगा। इस पूरे समय को विशेष सावधानी बरतने वाला काल माना जा रहा है।


क्या होता है पंचक काल
ये पंचक वह अवधि होती है जब चंद्रमा लगातार पांच नक्षत्रों, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्र पद, उत्तराभाद्र पद और रेवती में भ्रमण करता है। यह समय लगभग पांच दिनों तक रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान किए गए कुछ कार्य नकारात्मक प्रभाव दे सकते है। इसलिए इसे संवेदनशील समय कहा गया है।


मृत्यु पंचक क्यों माना जाता है अशुभ
शनिवार से शुरू होने वाले पंचक को मृत्यु पंचक कहा जाता है । यह अवधि दुर्घटनाओं, बीमारियों और अचानक आने वाले संकटों का संकेत दे सकती है। इसलिए इस दौरान सतर्क रहने और अनावश्यक जोखिम से बचने की सलाह दी जाती है।


इन कार्यों से जरूर करें परहेज
मृत्यु पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा से बचना चाहिए। क्योंकि इसे यमराज की दिशा माना जाता है। इस अवधि में घर का लेंटर डालना या छत बनवाना भी अशुभ माना गया है। नया बेड, चारपाई खरीदना या बनवाना भी वर्जित बताया गया है। क्योंकि इससे घर में अशांति आ सकती है। लकड़ी, घास या किसी भी ज्वलनशील वस्तु का संग्रह करना भी इस दौरान सहीं नहीं करना चाहिए।


मृत्यु होने पर अपनाई जाती है विशेष विधि
यदि पंचक के दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो अंतिम संस्कार सामान्य तरीके से नहीं किया जाता। दोष निवारण के लिए आटे या कुशा से बने पांच पुतलों का भी विधि-विधान से दाह संस्कार किया जाता है। माना जाता है कि ऐसे करने से परिवार का कुटुंब में इस तरह के अचानक दुखत समाचार नहीं मिलतें हैं।


सावधानी ही है सबसे बड़ा उपाय
ज्योतिष शास्त्र में मृत्यु पंचक को लेकर डरने की बजाय सावधानी बरतने पर जोर दिया है। इस दौरान बड़े और मांगलिक कार्यों को टालना और आवश्यक कार्यों में सतर्कता रखना ही सबसे उचित उपाय होगा।</description><guid>8613</guid><pubDate>05-Jun-2026 10:00:43 am</pubDate></item><item><title>विभुवन संकष्टी चतुर्थी आज : बुधवार के साथ बना दुर्लभ योग, जानिए पूजा का मुहूर्त और बुध मजबूत करने के आसान उपाय </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8607</link><description>धिकमास के कृष्ण पक्ष में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत आज रखा जा रहा है. जो हर तीन साल में एक बार ही आता है. धार्मिक मान्यता है कि आज के दिन व्रत, पूजा और कथा सुनने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाले संकट दूर होकर सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है. 3 जून बुधवार का दिन धार्मिक दृष्टि से बेहद खास बन गया है. इस बार चतुर्थी और बुधवार का संयोग बना है. ज्योतिष शास्त्र में दोनों ही भगवान गणेश को समर्पित दिन माने गए हैं. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर हो जाते हैं.




चंद्रोदय का समय और व्रत का महत्व
चतुर्थी तिथि की शुरुआत 3 जून को रात से हो चुकी है और यह 4 जून को रात 11:30 बजे तक रहेगी. संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता हैं. आज चंद्रोदय का समय रात 10:04 बजे माना गया है. इसलिए इसी समय पूजा के बाद व्रत पारण किया जाएगा.


गणेश पूजा से मिलेगा संकटों से छुटकारा
आज के दिन भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा और मोदक अर्पित करना विशेष फल देने वाला और संकटों को नाश करने वाला होगा. साथ ही ओम गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करने से गणपति बप्पा की कृपा प्राप्त होगी. जीवन में आ रही बाधाएं दूर होने लगेंगी.


बिना पन्ना पहने भी मजबूत होगा बुध
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बुधवार का दिन बुध ग्रह को समर्पित होता है. ऐसे में आज कुछ आसान उपाय करके बिना पन्ना पहने भी बुधदेव को मजबूत किया जा सकता है. ओम ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः मंत्र का जाप करें. हरे रंग के कपड़े पहनें और पौधे लगाएं. मीठा और विनम्र व्यवहार अपनाएं. मान्यता है कि बुध मजबूत होने से व्यक्ति की वाणी प्रभावशाली होती हैं. करियर व व्यापार में सफलता मिलती है.


व्रत कथा का विशेष महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार जब पांडव अपना राज्य हारकर वन में भटक रहे थे. तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कष्टों से मुक्ति का उपाय पूछा. तब श्रीकृष्ण ने विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत करने की सलाह दी. पांडवों ने द्रौपदी के साथ यह व्रत किया. जिससे उन्हें अपने सभी कष्टों से मुक्ति मिली और खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त हुआ.</description><guid>8607</guid><pubDate>03-Jun-2026 10:27:30 am</pubDate></item><item><title>साल का सबसे बड़ा ग्रह परिवर्तन : कर्क में गुरु का गोचर, कुछ राशियों की चमकेगी किस्मत, कुछ को लगेगा आर्थिक झटका </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8602</link><description> देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, भाग्य, समृद्धि और विस्तार का कारक कहा गया है. जब भी गुरु ग्रह अपनी राशि बदलते है तो उसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और वैश्विक स्तर पर भी परिवर्तन देखने को मिलता है. मंगलवार 2 जून को ऐसा ही एक बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है. जब बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे. खास बात यह है कि कर्क राशि गुरु की उच्च राशि है, जहां उनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है, यह गोचर 2 जून की रात 1 बजकर 47 मिनट पर होगा और 31 अक्टूबर तक प्रभावी रहेगा. यह गोचर जहां कुछ राशियों के लिए अत्यंत शुभ साबित होगा. वहीं कुछ जातकों को आर्थिक और मानसिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है. आइए जानते हैं किन राशियों पर क्या असर पड़ेगा.




मेष राशि
भाग्य मजबूत होगा. परिवार में सुख बढ़ेगा. नई संपत्ति के योग बनेंगे. साढ़ेसाती का असर कम होगा.


मिथुन राशि
संघर्ष बढ़ सकता है. धन आने में देरी होगी. काम में मेहनत ज्यादा लगेगी. परिवार को समय देना जरूरी.


कन्या राशि
आय के नए स्रोत बनेंगे. प्रमोशन या वेतन वृद्धि संभव. संपर्क मजबूत होंगे. निवेश से लाभ मिलेगा.


धनु राशि
आर्थिक जोखिम से बचें. उधार देने से नुकसान. रिश्तों में तनाव संभव. सावधानी जरूरी.


कर्क राशि
भाग्य का साथ मिलेगा. आध्यात्मिक रुझान बढ़ेगा. मान-सम्मान में वृद्धि. जीवन में संतुलन आएगा.


वृश्चिक राशि
शिक्षा में सफलता मिलेगी. संपत्ति बढ़ने के योग. परिवार का सहयोग मिलेगा. विदेश में अवसर मिल सकते है.


कुंभ राशि
आर्थिक स्थिति कमजोर रह सकती हैं. नौकरी में दबाव बढ़ेगा. स्वास्थ्य का ध्यान रखें. नकारात्मक सोच से बचें.</description><guid>8602</guid><pubDate>02-Jun-2026 10:50:33 am</pubDate></item><item><title>चारधाम यात्रा के साथ श्रद्धालुओं का रुख पांचवें धाम की ओर, उमड़ रही आस्था की भीड़ </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8596</link><description>देवभूमि उत्तराखंड में इन दिनों चारधाम यात्रा पूरे जोरों पर है. केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धामों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, इसके साथ ही श्रद्धालु राज्य के अन्य प्राचीन और अलौकिक धार्मिक स्थलों की ओर भी रुख कर रहे हैं. इन्हीं में से एक है टिहरी गढ़वाल की शांत वादियों में स्थित बूढ़ा केदारधाम जिसे उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है. यह पवित्र स्थल बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के संगम पर बसा हुआ है. यहां पहुंचते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है. खास बात यह है कि इस मंदिर के कपाट वर्षभर खुले रहते है. जिससे चारधाम यात्रा पर आए श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं.




मंदिर की अनोखी परंपरा
मंदिर की एक अनोखी परंपरा इसे और विशेष बनाती है, सदियों से यहां पूजा-अर्चना का दायित्व केवल नाथ संप्रदाय के योगियों के पास है. यह परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है. जो इस धाम की विशिष्ट पहचान बन चुकी है.


महाभारत काल से जुड़ा है धाम का इतिहास
बूढ़ा केदार धाम का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या और स्वजन हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की तलाश थी, इसी दौरान देवों के देव महादेव ने उन्हें एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए और अंतर्ध्यान होकर शिवलिंग में समाहित हो गए. इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम बूढ़ा केदार पड़ा.


स्कंद पुराण उल्लेख
स्कंद पुराण के केदारखंड में भी इस धाम का उल्लेख मिलता है. जहां इसे सोमेश्वर महादेव के रूप में वर्णित किया है. मान्यता यह भी है कि बूढ़ा केदार के दर्शन किए बिना केदारनाथ यात्रा अधूरी मानी जाती है.


कैसे पहुंचे बूढ़ा केदार धाम
बूढ़ा केदार धाम टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित है. यह टिहरी शहर से लगभग 60 किलोमीटर और ऋषिकेश से करीब 120 किलो मीटर की दूरी पर है. यहां पहुंचने के लिए ऋषिकेश या देहरादून से सड़क मार्ग के जरिए बस या टैक्सी आसानी से मिल जाती है. नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और देहरादून हैं. जबकि निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (देहरादून) है. जहां से सड़क मार्ग द्वारा धाम तक पहुंचा जा सकता है.</description><guid>8596</guid><pubDate>01-Jun-2026 11:17:02 am</pubDate></item><item><title>कालीचौड़ धाम सिद्धपीठ : चार धाम यात्रा के साथ करें इस चमत्कारी स्थल के दर्शन, पूरी होगी हर मनोकामना </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8584</link><description>उत्तराखंड की पावन धरती इस समय आस्था के रंग में रंगी हुई है. इन दिनों चार धाम यात्रा पूरे शबाब पर है. इसी बीच एक ऐसा सिद्धपीठ भी श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. जिसे ऋषियों की तपोभूमि और मां काली की प्रकट स्थली माना जाता है. नैनीताल जिले के काठगोदाम के पास स्थित कालीचौड़ धाम प्राचीन मंदिर देवी काली को समर्पित है. मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्ययुग में सप्तऋषियों ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भगवती की आराधना की थी. दिव्य सिद्धियां प्राप्त की थी. यही वजह है कि कालीचौड़ धाम को एक शक्तिशाली सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है.




कोलकाता के भक्त को दिए थे दर्शन
मंदिर की स्थापना को लेकर भी कई अद्भुत कथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि कलकत्ता के एक भक्त को स्वप्न में मां काली ने इस स्थान के दर्शन कराए थे. इसके बाद वह हल्द्वानी पहुंचा. अपने मित्र के साथ मिलकर इस दिव्य स्थल की खोज की, खोज के दौरान जमीन से मां काली सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रकट हुई. जिसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया.


आदि गुरु शंकराचार्य ने साधना की थी
आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखंड आगमन के दौरान यहां आकर साधना की थी. वहीं, आधुनिक संत पायलट बाबा ने भी इसी स्थान से आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त की थी.


कैसे पहुंचे
चार धाम यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए कालीचौड़ धाम एक विशेष आकर्षण है. यह स्थल हरिद्वार से लगभग 280 किलोमीटर और ऋषिकेश से करीब 260 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. खास बात यह है कि यह धाम केदारनाथ और बद्रीनाथ मार्ग के अपेक्षाकृत निकट पड़ता है. जिससे श्रद्धालु अपनी यात्रा के दौरान यहां आसानी से आ-जा सकते हैं.


यात्रा पूर्ण मानी जाती
कहा जाता है कि यदि कोई भक्त चार धाम यात्रा के साथ कालीचौड़ धाम के दर्शन भी करता है, तो उसे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है. उसकी यात्रा पूर्ण मानी जाती है. हालांकि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता जंगलों से होकर गुजरता है. जिससे यह यात्रा थोड़ी कठिन जरूर है, लेकिन आस्था के आगे हर कठिनाई छोटी पड़ जाती है.</description><guid>8584</guid><pubDate>29-May-2026 10:06:51 am</pubDate></item><item><title>10 से ज्यादा उंगलियां होना क्या भाग्यशाली होने की निशानी, सामुद्रिक शास्त्र में बताई गई है दिलचस्प बातें</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8583</link><description> कुछ लोगों की पहचान उनकी शारीरिक बनावट से भी खास बन जाती है. ऐसे ही कुछ लोग होते जिनके हाथ या पैरों में सामान्य से अधिक यानी 6 या उससे ज्यादा उंगलियां होती है. आमतौर पर इसे एक दुर्लभ शारीरिक स्थिति माना जाता है. लेकिन सामुद्रिक शास्त्र और ज्योतिष में इसे बेहद खास और शुभ संकेत मानते हैं. इतना ही नहीं, कुछ मान्यताओं के अनुसार ऐसे लोग किस्मत के धनी भी होते है.




उंगली की स्थिति बताती है ग्रहों का प्रभाव
यदि अतिरिक्त उंगली छोटी उंगली (लिटिल फिंगर) के पास होती है तो उस व्यक्ति पर बुध पर्वत का प्रभाव माना जाता है, जो बुद्धिमत्ता और वाणी से जुड़ा होता है. वहीं अगर यह अंगूठे के पास जुड़ी हो, तो शुक्र पर्वत का असर होता है. जो आकर्षण और सुख-सुविधाओं का प्रतीक है.


खास संकेत भाग्य और धन से जुड़ा है
हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र दोनों मानते हैं कि जिन लोगों के हाथ में छह या उससे ज्यादा उंगलियां होती हैं. वे बेहद भाग्यशाली होते हैं. खासकर जिनके हाथ में 10 से अधिक उंगलियां होती है. उनके बारे में कहा जाता है कि वे जीवन में खूब धन अर्जित करते है.


तेज दिमाग लेकिन रिश्तों में चुनौती बहुत होती
इन लोगों की एक बड़ी खासियत उनका तेज दिमाग माना जाता है कि ये लोग काम को तेजी और कुशलता से पूरा डालते है. हालांकि, ये दूसरों के कामों में कमी निकालने की आदत भी रखते है. जिससे कई बार रिश्तों में खटास आ जाती है.


मेहनत और लगन से मिलती है सफलता
6 उंगलियों वाले व्यक्तियों को मेहनती और समर्पित माना जाता. ये लोग अपने हर काम को पूरी लगन और ईमानदारी से करते और अक्सर अपने प्रयासों में सफलता हासिल करते है.


उंगलियों का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उंगलियों की संख्या और बनावट का सीधा संबंध मस्तिष्क की कार्यक्षमता से होता हैं. यही कारण है कि ध्यान और योग में अलग-अलग मुद्राओं का प्रयोग किया जाता है. जिससे मानसिक एकाग्रता बढ़ाई जा सके.</description><guid>8583</guid><pubDate>29-May-2026 10:05:20 am</pubDate></item><item><title>शाम के समय भूलकर भी न करें गलतियां, नाराज हो जाती हैं माता लक्ष्मी </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8577</link><description>मां लक्ष्मी सुख, समृद्धि और वैभव की देवी है. ऐसी मान्यता है कि जिस घर में साफ-सफाई, शांति और सकारातमक वातावरण होता है. वहां मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहता है, लेकिन कई बार लोग जाने-अनजाने में शाम के समय कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं. जिनसे माता लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संध्या का समय बेहद पवित्र माना गया है, इस दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है. शास्त्रों में बताया है कि शाम के समय घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, कई लोग आलस के कारण समय पर दीपक या लाइट नहीं जलाते. इससे नकारात्मक उर्जा बढ़ती है और लक्ष्मीजी घर से दूर चली जाती हैं. खासतौर पर मुख्य द्वार पर शाम के समय दीपक जलाना जरूरी होता है. इसके अलावा कई लोग शाम होते ही घर में झाड़ू लगाने लगते हैं. धर्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से घर की बरकत चली जाती है. हालांकि सफाई रखना अच्छी बात है, लेकिन शाम के समय झाड़ू लगाना शुभ नहीं माना गया. इसके बावजूद कई लोग रोज यह गलती करते हैं.




संध्या के समय सोना भी अशुभ होता है
शास्त्रों के अनुसार, शाम के समय सोना भी अशुभ माना गया है. संध्या के समय सोने से घर में आलस्य और दरिद्रता का वास बढ़ता है. बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि शाम के समय भगवान की पूजा, दीपक और भजन करना चाहिए, लेकिन आजकल लोग मोबाइल और टीवी में व्यस्त रहते हैं. धार्मिक ग्रंथो में यह भी बताया गया है कि शाम के समय घर में लड़ाई-झगड़ा या ऊंची आवाज में बोलना अशुभ होता है. इससे घर का सकारातमक माहौल खत्म होने लगता है. जहां रोज कलह होती है, वहां मां लक्ष्मी ज्यादा समय तक नहीं ठहरतीं है.


दूध-दही और नमक किसी को उधार ना दें
इसके अलावा शाम के समय दूध, दही या नमक किसी को उधार देना भी शुभ नहीं माना गया है. कई लोग इन बातों को अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में इसका विशेष महत्व बताया गया है. शाम का समय देवी-देवताओं की आराधना का समय होता है. ऐसे में इस दौरान साफ-सफाई, शांति, दीपक और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना चाहिए, मान्यता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं. घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है.</description><guid>8577</guid><pubDate>28-May-2026 10:04:05 am</pubDate></item><item><title>yeshtha Adhik Maas Purnima 2026 : कब है सर्व सिद्धिदायिनी ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा, इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा का विशेष महत्व </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8576</link><description> धर्म और आस्था के लिहाज से 31 मई को पड़ने वाली ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा अत्यंत विशेष मानी जा रही है. इसे सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा कहा जाता है. जिसका अर्थ है सभी प्रकार की सिद्धियां और पुण्य प्रदान करने वाली तिथि. इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया. मान्यता है कि अधिक मास में आने के कारण इस पूर्णिमा का फल सामान्य पूर्णिमा से कई गुना अधिक होता है.




शुभ मुहूर्त और तिथि का समय
पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 30 मई को सुबह 11:57 बजे से होगी. इसका समापन 31 मई को दोपहर 2:14 बजे तक रहेगा. उदया तिथि के अनुसार 31 मई को ही स्नान, दान, व्रत और पूजा की जाएगी. पूजा का शुभ समय सुबह 7:08 बजे से दोपहर 12:19 बजे तक रहेगा. जबकि चंद्रोदय रात 7:36 बजे होगा. इस दिन चंद्रमा की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है.


पूजा, व्रत और दान का विशेष फल
इस दिन भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा, सत्यनारायण कथा का पाठ और श्रवण करने से पापों का नाश होता है. घर में सुख-शांति आती है. अन्न, वस्त्र, स्वर्ण और गौदान का विशेष महत्व है. ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती है.


ध्यान एवं मेडिसिन करने से मन होता है शांत
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन का भी प्रतीक है. इस दिन ध्यान और मेडिटेशन करने से मन को शांति मिलती है. निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है, चंद्रमा के प्रभाव के कारण व्यक्ति भावुक और संवेदनशील भी हो सकता है. इसलिए संयम रखना आवश्यक माना है.


इन बातों का रखें विशेष ध्यान
पूर्णिमा के दिन तामसिक भोजन और नशे से दूर रहने की सलाह दी जाती है. माना जाता है कि इस दिन मन अधिक चंचल हो सकता है, इसलिए शांत वातावरण में रहना लाभकारी होता है. कमजोर मानसिक स्थिति वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.


सरल उपाय जो बदल सकते हैं भाग्य
पूर्णिमा या अमावस्या के दिन हनुमान मंदिर में दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है. इस दिन तुलसी या बिल्वपत्र तोड़ने से बचना चाहिए. रात में चांदनी में कुछ समय बिताना मानसिक शांति देता है. वहीं ध्यान और पूजा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. इस तरह ज्येष्ठ अधिक मास पूर्णिमा आस्था, साधना और आत्मिक शांति का एक दुर्लभ अवसर लेकर आ रही है. जिसे श्रद्धा और नियम के साथ मनाना विशेष फल दायी होता है.
</description><guid>8576</guid><pubDate>28-May-2026 10:01:58 am</pubDate></item><item><title>गुरु प्रदोष व्रत  : प्रदोष काल में करें भगवान शिव की पूजा, जानिए संपूर्ण विधि और महत्व </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8575</link><description>हिंदू धर्म में गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत शुभ अवसर है. ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 28 मई, गुरुवार को पड़ रही है. इसलिए इसीदिन गुरु प्रदोष व्रत रखा जाएगा. त्रयोदशी तिथि का आरंभ 28 मई सुबह 7:56 बजे से होगा और इसका समापन 29 मई सुबह 9:50 बजे तक रहेगा. इस व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में की जाती है. जो इस दिन शाम को लगभग 7 बजे से 9 बजे के बीच रहेगा. इस व्रत को करने से जीवन की बाधाएं दूर होती है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. विशेष रूप से जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति ग्रह कमजोर होता है. उनके लिए यह व्रत लाभकारी माना जाता है. इससे ज्ञान, मान-सम्मान और पारिवारिक सुख में वृद्धि होती है. संतान प्राप्ति और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करने वालों के लिए भी यह व्रत शुभ फल देने वाला माना गया है.




प्रदोष व्रत प्रारंभ करने की विधि
व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें. दिनभर निराहार रहें या फलाहार करें. शाम के समय पुनः स्नान कर पूजा स्थल को शुद्ध करें और प्रदोष काल में शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करे. भगवान शिव को बेलपत्र, चंदन, धतूरा और अक्षत अर्पित करें. गुरु प्रदोष होने के कारण पीले फूल और बेसन के लड्डू का भोग लगाना शुभ माना जाता है.


प्रदोष व्रत में इन मंत्रों का जाप करे
पूजा के दौरान ओम नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें. अंत में शिव-पार्वती की आरती कर प्रसाद ग्रहण करें. व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है.


प्रदोष व्रत में दान करना चाहिए
इस दिन चने की दाल या गुड़ का दान करना लाभकारी होता है. साथ ही पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. ध्यान रखें कि शिव पूजा में तुलसी और केतकी के फूल का उपयोग नहीं किया जाता है. प्रदोष काल में की गई शिव आराधना अत्यंत फल देने वाली कहलाती है. विधि-विधान से किया गया गुरु प्रदोष व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला है.</description><guid>8575</guid><pubDate>28-May-2026 9:57:51 am</pubDate></item><item><title>Ekadashi 2026 : पुरुषोत्तमी एकादशी का होता है बड़ा महत्व, दुर्लभ संयोग में व्रत और साधना का विशेष अवसर </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8570</link><description> Ekadashi 2026 : ज्येष्ठ में आने वाली पद्मिनी एकादशी, जिसे कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहा जाता है. श्रद्धालुओं के लिए साधना, संयम और भक्ति का महत्वपूर्ण अवसर लेकर आने वाली है. इस समय अधिकमास चल रहा है जो स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है. इसलिए इस माह में पड़ने वाली एकादशी का महत्व और भी बढ़ गया है. यह दिन आत्मशुद्धि, मनोकामना पूर्ति और पारिवारिक सुख-शांति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख एक ऐसे व्रत के रूप में मिलता है, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है.




अधिकमास के कारण एकादशी का महत्व बड़ा
अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक रहेगा. इस पूरे काल में भगवान विष्णु की उपासना, दान-पुण्य और व्रत करने का विशेष महत्व बताया गया है. इसी दौरान शुक्ल पक्ष में आने वाली पद्मिनी एकादशी को अत्यंत खास माना जाता है, क्योंकि यह अन्य एकादशियों की तुलना में अधिक प्रभावशाली मानी जाती है.


पद्मिनी एकादशी तिथि और व्रत का दिन
पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी तिथि का आरंभ 27 मई को सुबह 6:22 बजे से होगा. यह 28 मई सुबह 7:22 बजे तक रहेगी. उदया तिथि को मानते हुए व्रत 27 मई को रखा जाएगा.


एकादशी के दिन इस विधि से करें शुरुआत
इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए. व्रत रखने वाले श्रद्धालु निर्जल या फलाहार के साथ दिन भर भक्ति में लीन रहते है. विष्णु सहस्त्रनाम, पुराणों का पाठ और मंत्र जाप इस दिन विशेष रूप से किए जाते है. रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण का भी विशेष महत्व बताया गया है. अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण कर ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा दी जाती है.


पौराणिक कथा के अनुसार एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में इस एकादशी का महत्व विस्तार से वर्णित है. इसमें कहा गया है कि इस दिन किया गया जप और तप स्थान के अनुसार कई गुना प्रभाव देता है, घर, तीर्थ, गौशाला या मंदिर में किए गए पूजन का प्रभाव अलग-अलग स्तर पर बढ़ता जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में राजा कीर्तवीर्य और उनकी रानी संतान सुख से वंचित थे. देवी अनुसूया के बताएं अनुसार रानी ने पद्मिनी एकादशी का व्रत किया. इसके बाद उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन जैसे पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति हुई. जो आगे चलकर महान राजा बना. इस तरह पद्मिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा और साधना के माध्यम से जीवन को नई दिशा देने का अवसर मानी जाती है.</description><guid>8570</guid><pubDate>27-May-2026 10:34:20 am</pubDate></item><item><title>Ekadashi 2026 : पुरुषोत्तमी एकादशी का होता है बड़ा महत्व, दुर्लभ संयोग में व्रत और साधना का विशेष अवसर </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8566</link><description>ज्येष्ठ में आने वाली पद्मिनी एकादशी, जिसे कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहा जाता है. श्रद्धालुओं के लिए साधना, संयम और भक्ति का महत्वपूर्ण अवसर लेकर आने वाली है. इस समय अधिकमास चल रहा है जो स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है. इसलिए इस माह में पड़ने वाली एकादशी का महत्व और भी बढ़ गया है. यह दिन आत्मशुद्धि, मनोकामना पूर्ति और पारिवारिक सुख-शांति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख एक ऐसे व्रत के रूप में मिलता है, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है.




अधिकमास के कारण एकादशी का महत्व बड़ा
अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक रहेगा. इस पूरे काल में भगवान विष्णु की उपासना, दान-पुण्य और व्रत करने का विशेष महत्व बताया गया है. इसी दौरान शुक्ल पक्ष में आने वाली पद्मिनी एकादशी को अत्यंत खास माना जाता है, क्योंकि यह अन्य एकादशियों की तुलना में अधिक प्रभावशाली मानी जाती है.


पद्मिनी एकादशी तिथि और व्रत का दिन
पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी तिथि का आरंभ 27 मई को सुबह 6:22 बजे से होगा. यह 28 मई सुबह 7:22 बजे तक रहेगी. उदया तिथि को मानते हुए व्रत 27 मई को रखा जाएगा.


एकादशी के दिन इस विधि से करें शुरुआत
इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए. व्रत रखने वाले श्रद्धालु निर्जल या फलाहार के साथ दिन भर भक्ति में लीन रहते है. विष्णु सहस्त्रनाम, पुराणों का पाठ और मंत्र जाप इस दिन विशेष रूप से किए जाते है. रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण का भी विशेष महत्व बताया गया है. अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण कर ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा दी जाती है.


पौराणिक कथा के अनुसार एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में इस एकादशी का महत्व विस्तार से वर्णित है. इसमें कहा गया है कि इस दिन किया गया जप और तप स्थान के अनुसार कई गुना प्रभाव देता है, घर, तीर्थ, गौशाला या मंदिर में किए गए पूजन का प्रभाव अलग-अलग स्तर पर बढ़ता जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में राजा कीर्तवीर्य और उनकी रानी संतान सुख से वंचित थे. देवी अनुसूया के बताएं अनुसार रानी ने पद्मिनी एकादशी का व्रत किया. इसके बाद उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन जैसे पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति हुई. जो आगे चलकर महान राजा बना. इस तरह पद्मिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा और साधना के माध्यम से जीवन को नई दिशा देने का अवसर मानी जाती है.</description><guid>8566</guid><pubDate>26-May-2026 10:05:05 am</pubDate></item><item><title>Nautapa 2026 : सूर्य की तपिश के साथ शुरू हुआ पुण्य, उपासना और दान का विशेष समय </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8559</link><description> Nautapa 2026 : आज से नौतपा की शुरुआत हो गई है, जो 2 जून तक चलेगा. हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में नौतपा को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं. तभी से नौतपा आरंभ होता है और अगले 9 दिनों तक इसका प्रभाव बना रहता है. इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं. जिससे गर्मी अपने चरम पर पहुंच जाती है, तेज धूप, बढ़ता तापमान और लू के कारण इन दिनों को साल के सबसे गर्म दिनों में गिना जाता है. जो सभी को प्रभवित करते हैं. नौतपा केवल मौसम परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि यह तप, साधना और आत्मशुद्धि का विशेष काल भी माना जाता है. मान्यता है कि यदि नौतपा में सूर्य अधिक तपता है तो आने वाला मानसून अच्छा होता है. किसान भी इसे प्राकृतिक चक्र का अहम हिस्सा मानते है. क्योंकि तेज धूप खेतों में मौजूद कीट और हानिकारक जीवों को खत्म करने में मदद करती है.




दान-पुण्य और सूर्य उपासना कर विशेष महत्व
नौतपा के दौरान श्रद्धालु पूजा-पाठ, दान-पुण्य और सूर्य उपासना कर विशेष फल की कामना करते है. इस समय पवित्र नदियों, तालाबों और तीर्थ स्थलों पर स्नान और दान का विशेष महत्व बताया जाता है. पवत्रि नदियों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है, जहां लोग स्नान कर पितरों की शांति और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. मान्यता है कि इन दिनों जरूरतमंदों को शीतल वस्तुओं का दान करने से पुण्य फल मिलता है. सत्तू, घड़ा, छाता, पंखा, ठंडा जल और फल आदि का दान विशेष शुभ माना गया है. साथ ही प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करने और सूर्य मंत्रों का जाप करने से सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त होती है.


नौतप से जुडे खास मान्यताएं
नौतपा को तप, संयम और आत्मशुद्धि का विशेष समय माना गया है. इन 9 दिनों में किए गए दान-पुण्य से देवी-देवताओं और पितरों की कृपा प्राप्त होती है.


नौतपा के दौरान अपनाएं ये आसान उपाय
इन दिनों शीतल वस्तुओं का दान करें, जरूरतमंदों को पानी पिलाएं. घर में जल से भरा घड़ा रखें. सुबह सूर्य को अर्घ्य देना और सात्विक भोजन करना भी शुभ माना जाता है.


सूर्य उपासना से ऊर्जा, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि मिलने की मान्यता
नौतपा में सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है. प्रतिदिन सूर्य मंत्रों का जाप और जल अर्पित करने से जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और सकारात्मकता बनी रहती है.</description><guid>8559</guid><pubDate>25-May-2026 12:08:21 pm</pubDate></item><item><title>इस एकादशी पर चुके, तो 3 साल करना होगा इंतजार </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8556</link><description>एकादशी व्रत को अत्यंत फलदायी माना गया है, लेकिन जब यह एकादशी अधिकमास जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं, में आती है तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है. इस बार 27 मई को पड़ने वाली पद्मिनी एकादशी भक्तों के लिए एक दुर्लभ अवसर लेकर आई है. यह एकादशी पर उपाय करने से चूक गए तो फिर लगभग 3 साल का इंतजार करना पड़ता है.




कब शुरू होगी एकादशी तिथि
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 मई सुबह 5:11 बजे से शुरू होकर 27 मई सुबह 6:22 बजे तक रहने वाली है. उदया तिथि के आधार पर व्रत 27 मई को रखा जाएगा. इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन के सभी कष्ट दूर होते है, और सुख-समृद्धि का आगमन होता है.


क्यों 10 गुना बढ़ जाता है अधिकमास का पुण्य?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. जो भगवान विष्णु को समर्पित है. अन्य महीनों की तुलना में इस माह में किए गए जप, तप, दान और व्रत का फल 10 गुना तक बढ़ जाता है, इसका कारण यह है कि यह अतिरिक्त मास ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है, इसे भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. इसलिए इस दौरान किए गए पुण्य कर्म सीधे ईश्वर की कृपा से कई गुना फल दायी बन जाते है.


पद्मिनी एकादशी पर दान से मिलेगा विशेष फल
पद्मिनी एकादशी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है. इस दिन तांबा दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है, करियर में आ रही बाधाएं दूर होती हैं. गुड़ का दान करने से सूर्य मजबूत होता है. भाग्य का साथ मिलने लगता है. शंख का दान करने से घर में लक्ष्मी का वास होता है और आर्थिक स्थिति सुधरती है. जरूरतमंदों को वस्त्र दान करना महादान माना गया है, जिससे दरिद्रता दूर होती है. इसके अलावा, अपनी आय का कुछ हिस्सा किसी नेक कार्य में लगाना भी अत्यंत शुभ होगा. पद्मिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने का एक दुर्लभ अवसर है.</description><guid>8556</guid><pubDate>24-May-2026 10:36:31 am</pubDate></item><item><title>चुराया हुआ मनी प्लांट लाता है बरकत या बढ़ाता है नुकसान, जानें वास्तु का असली सच </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8554</link><description>घरों की सजावट में पेड़-पौधों का खास महत्व बढ़ गया है. कई लोग गार्डनिंग के शौक में तरह-तरह के पौधे लगाते है. तो वहीं कुछ लोग खास तौर पर ऐसे पौधे चुनते है. जिन्हें गुडलक और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. इन्हीं में से एक है मनी प्लांट, जो लगभग हर घर में देखने को मिल जाता है. मान्यता है कि इसे लगाने से घर में धन की आवक बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. लेकिन मनी प्लांट को लेकर एक दिलचस्प धारणा भी प्रचलित है, अगर इसे चुरा कर लगाया जाए तो यह ज्यादा फलदायी होता है. इस बात पर विश्वास भी करते हैं, लेकिन क्या सच में ऐसा है? वास्तु शास्त्र के अनुसार मनी प्लांट घर में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा लाता है, लेकिन यह तभी संभव है जब इसे सही तरीके से लगाया और संभाला जाए. इसलिए अंधविश्वास से बचें और सही नियमों का पालन करें, तभी यह पौधा आपके घर में खुशहाली ला सकता है.




क्या सच में चुराया हुआ मनी प्लांट देता है लाभ
वास्तु शास्त्र के अनुसारकिसी भी चीज को चोरी करके लाना शुभ नहीं माना जाता. ऐसे में मनी प्लांट को चुराकर लगाना भी गलत ही कहा जायेगा. वास्तु विशेषज्ञों का कहना है कि हमेशा पौधे को खरीदकर या सही तरीके से प्राप्त करके ही घर में लगाना चाहिए. तभी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है.


फिर क्यों प्रचलित हुई यह मान्यता
दरअसल, पहले के समय में लोग अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों के घर से मनी प्लांट की छोटी कटिंग लेकर आते थे, यह कटिंग आसानी से उग जाती थी, इसलिए धीरे-धीरे इसे चुराया हुआ मनी प्लांट कहा जाने लगा. समय के साथ यह बात एक मान्यता में बदल गई, जबकि इसका वास्तु से कोई संबंध नहीं है.


मनी प्लांट लगाने के सही नियम
वास्तु शास्त्र के अनुसार मनी प्लांट को घर की दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना सबसे शुभ होता जाता है. यह दिशा धन और समृद्धि से जुड़ी होती है. इसलिए यहां रखने से घर में बरकत बनी रहती है.


इन गलतियों से बचना है बहुत जरूरी है
मनी प्लांट की सही देखभाल भी बेहद जरूरी है. इसके पत्ते अगर पीले या सूखे हो जाएं तो उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए, क्योंकि सूखा पौधा नकारात्मक ऊर्जा का संकेत देता है. इसके अलावा पौधे को कभी भी गंदे पानी में न रखें और न ही बहुत अंधेरी जगह पर रखे. ध्यान रखें कि मनी प्लांट की बेल हमेशा ऊपर की ओर बढ़नी चाहिए, इसे जमीन पर फैलने न दें. साथ ही, इस पौधे को बार-बार इधर-उधर स्थानांतरित करने से भी बचना चाहिए.</description><guid>8554</guid><pubDate>23-May-2026 11:11:09 am</pubDate></item><item><title>एक दिन में मिलेगा साल की 24 एकादशी का पुण्य, कब रखा जाएगा निर्जला एकादशी व्रत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8552</link><description>एकादशी व्रत भगवान विष्णु की कृपा पाने का सबसे श्रेष्ठ दिल माना गया है. साल में 24 एकादशी का व्रत रखा जाता है एक शुक्ल पक्ष और एक कृष्ण पक्ष लेकिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी का स्थान विशेष माना जाता है. भीषण गर्मी के बीच रखा जाने वाला यह व्रत तप और संयम का प्रतीक होता है. इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है और मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशी का पुण्य प्राप्त होता है.






पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार निर्जला एकादशी की तिथि 24 जून को शाम 06:12 बजे शुरू होगी और 25 जून को रात्रि 08:09 बजे तक रहेगी. उदया तिथि को आधार मानते हुए व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा. वहीं इस व्रत का पारण 26 जून शुक्रवार को सुबह 5:25 बजे से 8:13 बजे के बीच किया जाएगा.


सबसे कठिन एकादशी व्रत
निर्जला एकादशी को वर्ष का सबसे कठिन व्रत माना जाता है, क्योंकि इसमें साधक बिना अन्न और जल के उपवास रखते हैं. गर्मी के मौसम में इस व्रत का पालन करना तप के समान है. हालांकि इसे अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार करने की सलाह दी जाती है, यदि कोई निर्जल नहीं रह सकता, तो वह फलाहार के साथ भी व्रत कर सकता है.


एकादशी की पूजा-विधि और नियम
इस दिन प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प ले. पीले वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा करे. पूजा में पीले पुष्प, चंदन, केसर, धूप, दीप, फल, मिठाई और तुलसी दल अर्पित करे. ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप कर लक्ष्मीनारायण की आरती की जाती है.


एकादशी तिथि पर दान और पारण का महत्व
निर्जला एकादशी पर जल से भरा कलश, फल, वस्त्र, पंखा और रुपयों का दान विशेष माना गया है. अगले दिन निर्धारित समय में व्रत का पारण करने के बाद ही अन्न ग्रहण करे. इस दिन किए गए दान और उपासना का विशेष महत्व बताया गया है.</description><guid>8552</guid><pubDate>22-May-2026 10:27:48 am</pubDate></item><item><title>चार धाम यात्रा में बद्रीनाथ दर्शन के बाद जरूर लाएं ये पवित्र माला, जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का बना रहेगा आशीर्वाद </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8551</link><description>इन दिनों चार धाम यात्रा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है. श्रद्धालु पारंपरिक क्रम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ का पालन करते हुए अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण कर रहे है, इस यात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बद्रीनाथ धाम होता है. जहां भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप के दर्शन के साथ यात्रा का समापन हो जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां से कुछ विशेष पूजन सामग्री अपने साथ लाना अत्यंत शुभ और फल देने वाले सुख समृद्धि में वृद्धि करने वाला माना जाता है.






बदरी तुलसी माला का विशेष महत्व
बद्रीनाथ धाम में भगवान बद्री नारायण को चढ़ाई जाने वाली बदरी तुलसी को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है. इस माला के बिना भगवान की पूजा अधूरी रहती है, यही कारण है कि श्रद्धालु दर्शन के बाद इस तुलसी माला को अवश्य धारण करते है. इसे पहनने से मानसिक शांति प्राप्त होती है. नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है. इसके साथ ही ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र के जाप के लिए यह माला अत्यंत प्रभावी मानी जाती है.


विजय यश और समृद्धि का प्रतीक वैजयंती माला
वैजयंती माला से मिलता है विजय का आशीर्वाद
वैजयंती माला भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है. इसे विजय, यश और समृद्धि का प्रतीक है. बद्रीनाथ धाम की यात्रा के दौरान यह माला स्थानीय बाजारों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है. मान्यता है कि जो व्यक्ति इस माला को धारण करता है, वह जीवन की कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता है, उसके जीवन में सफलता के द्वार खुलते हैं. साथ ही, इस माला को धारण करने से भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है.


यात्रा का पुण्य बढ़ाती हैं ये पवित्र वस्तुएं
चार धाम यात्रा केवल दर्शन तक सीमित नहीं होती, बल्कि वहां से लाई गई, पवित्र वस्तुएं भी जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा बनाए रखने का माध्यम बनती हैं. बद्रीनाथ धाम से लाई गई बदरी तुलसी और वैजयंती माला श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का प्रतीक होती हैं.


सुख, शांति और समृद्धि का वास
इन मालाओं को घर लाने और धारण करने से न केवल यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त होता है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का भी वास होता है. यही वजह है कि बद्रीनाथ धाम से लौटते समय श्रद्धालु इन पवित्र मालाओं को अपने साथ लाना नहीं भूलते. अब आप या आपके परिचित या परिवार का कोई व्यक्ति चार धाम यात्रा पर जा रहा है तो यह माल मंगाना ना भूले.</description><guid>8551</guid><pubDate>22-May-2026 10:25:41 am</pubDate></item><item><title>किस दिन बाल और नाखून काटना माना जाता है सही? जानिए क्या कहती हैं परंपराएं </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8550</link><description>हिंदू परंपराओं में बाल और नाखून काटने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित है. घर के बड़े अक्सर मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को ऐसा करने से मना करते हैं. माना जाता है कि सप्ताह का हर दिन किसी ग्रह और देवी-देवता से जुड़ा होता है, इसलिए इन दिनों कुछ कामों से बचने की सलाह दी जाती है. ज्योतिष शास्त्र में बाल और नाखून को भी शरीर की ऊर्जा से जोड़कर देखा गया है. यही वजह है कि पुराने समय से इनके काटने के लिए विशेष दिनों का उल्लेख मिलता है.






मंगलवार को क्यों नहीं काटते बाल और नाखून?
मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह और भगवान हनुमान से होता है. कई लोगों की मान्यता है कि इस दिन बाल या नाखून काटने से घर में तनाव बढ़ सकता है. ज्योतिष में यह भी कहा जाता है कि कमजोर मंगल होने पर आर्थिक मामलों में परेशानियां बढ़ सकती है. मंगलवार का दिन ऊर्जा, शक्ति और साहस का प्रतीक होता है. पुराने समय में माना जाता था कि इस दिन शरीर से जुड़ी कोई चीज काटना, जैसे नाखून या बाल, शुभ नहीं होता है. ऐसा करने से घर की सकारात्मक ऊर्जा कम हो सकती है. इसलिए लोग इस दिन ज्यादा से ज्यादा पूजा-पाठ और संयम पर ध्यान देते थे और ऐसे कामों से बचते थे.


गुरुवार को क्या मान्यता है?
गुरुवार भगवान बृहस्पति और गुरु ग्रह का दिन माना जाता है. परंपराओं के अनुसार इस दिन बाल कटवाने से शिक्षा, निर्णय क्षमता और पारिवारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है. कुछ लोग इसे दांपत्य जीवन से भी जोड़कर देखते हैं.


शनिवार को बाल कटवाने से क्यों बचते हैं?
शनिवार शनिदेव को समर्पित माना जाता है. कई परिवारों में आज भी इस दिन बाल और नाखून काटने से परहेज किया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से आर्थिक और मानसिक परेशानियां बढ़ सकती हैं. शनिदेव को कर्मों का फल देने वाला देवता कहा जाता है. लोगों का विश्वास है कि इसदिन किए गए कामों का प्रभाव जीवन पर गहरा पड़ता है. इसी वजह से कई लोग शनिवार को नाखून और बाल काटने से बचते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से शनिदेव नाराज हो सकते है और जीवन में बाधाएं या परेशानियां बढ़ सकती है. इस लिए इस दिन लोग पूजा-पाठ, दान और सेवा जैसे कामों पर ज्यादा ध्यान देते है.


किस दिन शुभ माना जाता है?
सोमवार को नाखून काटना कई जगह शुभ माना जाता है. कुछ मान्यताओं में इसे सकारात्मक ऊर्जा और अच्छी सेहत से जोड़कर देखा जाता है, हालांकि ज्योतिष और परंपराओं से जुड़ी इन बातों के वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन भारतीय परिवारों में इन्हें आज भी महत्व दिया जाता है और निभाया जाता है.</description><guid>8550</guid><pubDate>22-May-2026 10:23:33 am</pubDate></item><item><title>गुरुवार के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना कमजोर हो सकता है गुरु ग्रह</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8547</link><description> गुरुवार का दिन देव गुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु को समर्पित होता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में गुरु की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं. यदि गुरु मजबूत हो तो जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता मिलती है, जबकि इसके कमजोर होने पर आर्थिक तंगी, करियर में बाधा और वैवाहिक जीवन में समस्याएं सामने आ सकती हैं. ऐसे में गुरुवार के दिन कुछ विशेष उपाय करने के साथ-साथ कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना भी बेहद जरूरी होता है.






साबुन-शैंपू का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार के दिन साबुन और शैंपू का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. माना जाता है कि ऐसा करने से गुरु ग्रह कमजोर होता है. व्यक्ति को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता हैं. इसी तरह इस दिन बाल कटवाना और नाखून काटना भी अशुभ होता है. ये आदतें न केवल गुरु की कृपा को कम करती हैं, बल्कि घर में नकारात्मकता को भी बढ़ा सकती है.


उधार लेन-देन नहीं करना चहिए
इसके अलावा, गुरुवार के दिन किसी से उधार लेना या किसी को पैसा देना भी ठीक नहीं हाेता है. मान्यता है कि इस दिन किया गया लेन-देन आर्थिक स्थिति को कमजोर कर सकता है. धन हानि का कारण बन सकता है. इसलिए इस दिन वित्तीय लेन-देन से बचना चाहिए.


सूर्यास्त के बाद झाड़ू नहीं लगाना
कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है. गुरुवार की शाम के समय भी कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू लगाना अशुभ माना जाता है. ऐसा करने से घर की लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं और आर्थिक तंगी बढ़ सकती है.


इन कार्यों को करना चाहिए
कुछ उपाय करने से गुरु को मजबूत किया जा सकता है. जैसे पानी में हल्दी डालकर स्नान करना, पीले वस्त्र धारण करना, भगवान विष्णु की पूजा करना और केले के पेड़ की पूजा करना. साथ ही ओम बृ बृहस्पते नमः मंत्र का जाप करने से भी सकारात्मक परिणाम मिलते है. गुरुवार के दिन पीली वस्तुओं का दान करना भी अत्यंत शुभ कहा जाता है. यह न केवल गुरु को मजबूत करता है, बल्कि जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी लाता है. इसलिए इस दिन सही आचरण और सावधानियों का पालन करना बेहद आवश्यक है, ताकि जीवन में खुशहाली बनी रहे.</description><guid>8547</guid><pubDate>21-May-2026 11:36:01 am</pubDate></item><item><title>Adhik Mash 2026 : अब 1 महीने अपनी दिनचर्या को बदलने की जरूरत, क्या करें और क्या ना करें </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8544</link><description>17 मई से अधिक मास की शुरुआत हो चुकी है, जो 15 जून तक रहेगा. इस एक महीने के दौरान धार्मिक रूप से लोगों को अपनी दिनचर्या बदलने की जरूरत है, ऐसे में सवाल यह है कि इस पूरे समय में क्या करना चाहिए. किन कामों से दूरी बनानी चाहिए.






क्या करें?
अधिक मास के दौरान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है. रोज सुबह स्नान के बाद पूजा करन. पीले फूल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करना, आम तौर पर अपनाया जाता है. कई लोग सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ या श्रवण भी करते हैं.
इस दौरान मंत्र जाप और धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी बढ़ जाता है. ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप, गीता, रामचरितमानस और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से लोगों को मानसिक शांति और एकाग्रता मिलती है.
दान-पुण्य भी इस महीने का महत्वपूर्ण हिस्सा है. जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, पीली वस्तुएं और धन का दान किया जाता है. साथ ही सात्विक जीवन अपनाने पर जोर दिया जाता है. जिसमें सादा भोजन, संयमित व्यवहार और सकारात्मक सोच शामिल है.
भजन-कीर्तन, सत्संग और व्रत रखने की परंपरा भी इस दौरान देखने करनी चाहिए. कई जगहों पर सामूहिक धार्मिक आयोजन होते है। जिनमें लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.
क्या न करें?
अधिक मास के दौरान कुछ कार्यों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है. विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य आमतौर पर इस समय टाल ही बेहतर होता है.
खान-पान में भी सावधानी रखने की जरूरत होती है. मांसाहार, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहना इस अवधि में जरूरी माना जाता है.
इसके अलावा व्यवहार में संयम रखना भी अहम होता है. किसी का अपमान करना, कटु वचन बोलना या विवाद में पड़ना टालना चाहिए. साथ ही छल-कपट, झूठ और अनैतिक कार्यों से दूरी बनाए रखने पर जोर दिया जाता है.
इस तरह अधिक मास का यह एक महीना लोगों के लिए अपनी आदतों, सोच और दिनचर्या को संतुलित करने का समय होता है. जिसमें वे अनुशासन और सकारात्मकता की ओर ध्यान केंद्रित करते है.</description><guid>8544</guid><pubDate>21-May-2026 11:12:49 am</pubDate></item><item><title>सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश से बदलेगा आसमान का मिजाज, नौतपा की तपिश में खुलेगी कुछ राशियां की किस्मत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8543</link><description>सूर्य का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश एक ऐसा ज्योतिषीय परिवर्तन है, जो सीधे तौर पर प्रकृति, मौसम और मानव जीवन तीनों को प्रभावित डालता है. इसी दिन से नौतपा की शुरुआत मानी जाती हैं, वो 9 दिन जब धरती आग की तरह तपती है, लेकिन इस तपिश के बीच ज्योतिष संकेत देता है कि कुछ राशियों के लिए यही समय धन, तरक्की और खुशियों का द्वार भी खोल सकता है.






नौतपा की शुरुआत कब से होगी
ज्योतिषीय गणना बताती है कि 25 मई को दोपहर 3.44 मिनट पर सूर्य देव कृतिका नक्षत्र से निकलकर रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे. इसी के साथ नौतपा शुरू होगा, जो 2 जून तक रहेगा. मान्यता है कि इन 9 दिनों में सूर्य का रौद्र रूप देखने को मिलता है. गर्मी अपने चरम पर पहुंच जाती है.


आखिर क्यों खास है रोहिणी नक्षत्र का गोचर
रोहिणी नक्षत्र वृषभ राशि में आता है. जिसके स्वामी शुक्र हैं. नक्षत्र के अधिपति चंद्रमा है. दोनों ही ग्रह शीतलता और सौंदर्य के प्रतीक माने जाते है, वहीं सूर्य अग्नि और ऊर्जा के कारक है. जब सूर्य इस नक्षत्र में प्रवेश करते है, तो उनकी उग्र ऊर्जा वातावरण को असंतुलित कर देती है. जिससे भीषण गर्मी बढ़ती है.


सूर्य-शुक्र की टकराहट बढ़ाती है भीषण गर्मी
सूर्य और शुक्र परस्पर विरोधी ग्रह है, सूर्य जहां तप और अनुशासन का प्रतीक है. वहीं शुक्र सुख और भोग-विलास का कारक है. रोहिणी में सूर्य का प्रवेश इन दोनों ऊर्जाओं के टकराव का संकेत माना जाता है, जिससे वातावरण में तीव्र गर्मी महसूस होती है.


तपिश के बीच किस्मत का साथ भी मिलेगा
जहां एक ओर नौतपा लोगों को गर्मी से बेहाल करने वाला है, वहीं कुछ राशियों के लिए यह समय बेहद शुभ संकेत लेकर आएगा. करियर में उन्नति, धन लाभ और नए अवसर मिलने के योग बन सकते है. जिसमें मेष, वृषभ, सिंह और कन्या राशि वालों के लिए यह समय बेहतर होने वाला है यानी यह दौर सिर्फ तपन ही नहीं, बल्कि तरक्की का भी संकेत है.


क्या करें, ताकि मिले सूर्य की कृपा
इस अवधि में सुबह सूर्योदय के वक्त तांबे के लोटे से जल में लाल चंदन मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए. ओम घृणि सूर्याय नमः मंत्र का जाप करना चाहिए, और गेहूं, गुड़ या तांबे का दान करना शुभ माना गया है. इस पूरी अवधि में अहंकार, क्रोध और बड़ों के अपमान से बचने की सलाह दी जाती है.</description><guid>8543</guid><pubDate>21-May-2026 11:10:04 am</pubDate></item><item><title>Char Dham Yatra : जीवन में एक बार यह यात्रा करना क्यों है जरूरी, जानिए प्रत्येक स्थान का धार्मिक महत्व </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8484</link><description>चारधाम यात्रा 2026 का शुभारंभ 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन होगा. इस दिन यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट एक साथ खुलेंगे. केदारनाथ 22 अप्रैल और बद्रीनाथ 23 अप्रैल को खुलेंगे. अक्षय तृतीया के शुभ योग में शुरू होने वाली यह यात्रा अत्यंत मंगलकारी मानी जाती है. हिंदू धर्म में चारधाम यात्रा का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. इसे कलयुग में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है.




मान्यता है कि जीवन में एक बार यह यात्रा करने से पापों का नाश होता है. व्यक्ति पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सकता है. यात्रा का पारंपरिक क्रम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ है, जो नदियों के प्रवाह और धार्मिक परंपराओं के अनुसार निर्धारित है. यह यात्रा शक्ति से शिव और फिर विष्णु तक के आध्यात्मिक मार्ग का प्रतीक मानी जाती है. यमुनोत्री में स्नान, गंगोत्री का पवित्र जल, केदारनाथ का शिव महत्व और बद्रीनाथ में विष्णु पूजा-ये सभी मिलकर चारधाम यात्रा को पूर्ण आध्यात्मिक अनुभव बनाते हैं.


प्रत्येक स्थान का धार्मिक महत्व


यमुनोत्री, उत्तरकाशी जिले में स्थित है. जंहा मां यमुना की पूजा होती है. मंदिर का निर्माण 1839 में महाराजा सुदर्शन शाह द्वारा कराया गया था.
गंगोत्री वह पवित्र स्थान है. जंहा देवी गंगा के अवतरण की मान्यता है और इसका निर्माण अमर सिंह थापा के संरक्षण में हुआ था.
केदारनाथ बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे उत्तरी है. इसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में की थी और बाद में राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया.
बद्रीनाथ मंदिर का पुनरुद्धार भी आदि शंकराचार्य ने किया था और बाद में गढ़वाल राजाओं ने इसे विकसित किया.
</description><guid>8484</guid><pubDate>18-Apr-2026 10:39:48 am</pubDate></item><item><title>हनुमान जयंती पर विशेष : जहां हनुमान, वहीं समाधान- रामभक्ति का महा विज्ञान</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8452</link><description>भारत की सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व जीवन को दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक संदेश होता है। देश में मनाए जाने वाले पावन पर्वों में हनुमान जयंती का विशेष स्थान है। यह एक ऐसा दिवस है, जो हमें भक्ति, सेवा, साहस और विनम्रता को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। पवनपुत्र हनुमानजी के जन्म का उत्सव एक दिव्य चेतना का स्मरण है, जो मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाता है।


हनुमान जी का दिव्य अवतरण का आध्यात्मिक संकेत
भगवान शिव के रुद्रांश अवतार हैं हनुमान जी ऐसी पौराणिक मान्यता है। भगवान शिव के रुद्रांश अवतार ने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए वानर रूप में अवतार लिया। चैत्र मास की पूर्णिमा को जन्म लेने वाले हनुमान जी को केवल बल का प्रतीक नहीं बल्कि भक्ति और बुद्धि के आदर्श के रूप में भी देखा जाता है।द्रिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष हनुमान जयंती 2 अप्रैल को है । हनुमान जयंती का दिन आत्मशुद्धि, संकल्प और साधना के लिए बहुत ही उपयुक्त दिन है जब व्यक्ति अपने भीतर छिपी ऊर्जा को पहचान सकता है।






हनुमान जी की बाल लीला थी शक्ति का प्रारंभिक संकेत
हनुमान जी के बाल्यकाल की कथाएँ दिव्यता का प्रमाण हैं । सूर्य को फल समझकर निगल लेने वाली चमत्कारिक घटना उनके असीम साहस और ऊर्जा को दिखाने वाला है। इस प्रसंग से हमें पता चलता है कि शक्ति का सही दिशा में उपयोग ही उसे दिव्यता प्रदान करता है।


राम मिलन से आरम्भ हुआ हनुमान का वास्तविक जीवन
ऋष्यमूक पर्वत पर जब हनुमान ने श्रीराम और लक्ष्मण को देखा तो उनके भीतर का ज्ञान जाग उठा। ब्राह्मण वेश में उन्होंने जो संवाद किए उसने स्वयं श्रीराम को भी प्रभावित किया। यह केवल संवाद नहीं था बल्कि उनकी आत्मा का मिलन था। जब हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा मैं आपका दास हूँतभी से उनका जीवन उद्देश्य स्पष्ट हो गया।ऐसे क्षण हमें सिखाते हैं कि जीवन को दिशा तब ही मिलती है जब हम अपने अहंकार को त्यागकर किसी उच्च उद्देश्य से जुड़ते हैं।कहा जा सकता है हनुमान जी का वास्तविक जीवन तब शुरू हुआ जब उनकी भेंट भगवान श्रीराम से हुई।




भक्ति की उड़ान से लांघ पाए समुद्र
जब माता सीता के खोज की ज़िम्मेवारी सामने आई तब समुद्र के तट पर वानर सेना असमंजस में थी और जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था। जैसे ही हनुमान जी को अपने सामर्थ्य का बोध हुआ तत्क्षण उन्होंने कहायदि यह कार्य राम का है तो अवश्य संभव होगायहाँ हनुमान जी की उड़ान, भौतिक उड़ान नहीं थी बल्कि यह आत्मविश्वास और भक्ति की उड़ान थी। हनुमान जी के मार्ग में आने वाली मैनाक पर्वत, सुरसा और सिंहिका जैसी बाधाएँ हम सभी के जीवन की चुनौतियों का प्रतीक हैं। हनुमान जी हर बाधा को बल और बुद्धि से पार करके हमें जीवन का मूल मंत्र दिया है।


अशोक वाटिका में किया था आशा का संचार
अशोक वाटिका में जब हनुमान जी ने माता सीता को राम की मुंदरी दी थी तब वह केवल एक अंगूठी नहीं थी बल्कि माता के लिए आस की एक किरण थी ने कहाराम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ अशोका वाटिका का यह प्रसंग बताता है कि संकट में व्यक्ति को केवल सहायता नहीं बल्कि विश्वास और आश्वासन की आवश्यकता होती है।




लंका दहन थी अधर्म के विरुद्ध चेतना
हनुमान जी द्वारा लंका दहन केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था बल्कि अधर्म के विरुद्ध स्पष्ट चेतावनी थी। उनकी पूँछ में लगी आग ने रावण के अभिमान को तो जलाया मगर अशोक वाटिका को सुरक्षित रखा।इस प्रसंग से स्पष्ट है कि भक्ति विनाश नहीं करती बल्कि अधर्म का शोधन करती है।


सेवाभाव का चरमोत्कर्ष था संजीवनी प्रसंग
राम-रावण युद्ध में जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे तब हनुमान जी ने संजीवनी पर्वत लाकर उन्हें जीवनदान दिया था । यह घटना सेवा और समर्पण की पराकाष्ठा थे मगर विशेष बात यह रही कि इतना महान कार्य करने के बाद भी हनुमान जी ने इसका श्रेय स्वयं नहीं लिया उन्होंने इसे भी प्रभु श्री राम की कृपा बताया। हनुमान जी का संपूर्ण जीवन इस बात का दर्शन है कि सच्ची भक्ति पूरी तरह से अहंकार रहित होता है। उन्होंने हमेशा अपने बल के प्रदर्शन से पहले हर कार्य में विनम्रता को प्राथमिकता दी। संकटमोचन हनुमान को गोस्वामी तुलसीदास ने महाप्रभु कहा है,एक ऐसा भक्त, जो आज भी जीवित है, हर उस स्थान पर जहाँ भी राम का नाम लिया जाता है।




आधुनिक दृष्टिकोण : विज्ञान और हनुमान
21वीं सदी में हनुमान जी को धार्मिकता के इतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है। उनका सूक्ष्म और विराट रूप सूक्ष्म और विस्तार विज्ञान का प्रतीक कहा जा सकता है। उनका समुद्र लांघना, ऊर्जा और आत्मविश्वास का उत्कृत उदाहरण है।उनका सही वक्त पर संजीवनी लाना चिकित्सा विज्ञान की महत्ता की ओर ईशारा है। प्रख्यात कथावाचक मोरारी बापू मानते हैं कि हनुमान जी को भजन और योग विज्ञान का गहरा ज्ञान था। वहीं प्रख्यात कथावाचक रमेश भाई ओझा हनुमान जी को निस्वार्थ सेवा, निर्भयता और रामनाम की शक्ति का प्रतीक मानते हैं।


प्राचीन मान्यता है कि जहाँ हनुमान चालीसा का पाठ होता है वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं। हनुमान जी का नाम स्वयं ही एक मंत्र है जो भय, दुख और संकट को दूर करता है। हनुमान जयंती का दिन हमें याद दिलाने वाला होता है कि सच्ची शक्ति दूसरों के कल्याण में निहित होता है। जहां तक हो सके हनुमान जयंती व्रत का संकल्प लेना चाहिए इस दिन यथा सम्भव हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्वलित कर सिंदूर, चमेली का तेल, लाल पुष्प, गुड़-चना और बूंदी के लड्डू अर्पित करें। हनुमान जी केवल एक महत्वपूर्ण पौराणिक पात्र होने के साथ ही साथ एक जीवंत विश्वास भी हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है जहाँ राम हैं, वहाँ हनुमान हैं और जहाँ हनुमान हैं, वहाँ विजय, विवेक और विश्वास है। और अंत में वह स्तुति जो केवल शब्द नहीं बल्कि उस शक्ति का आह्वान है जो हमें हर संकट से उबार सकती है।</description><guid>8452</guid><pubDate>02-Apr-2026 11:03:08 am</pubDate></item><item><title>Jhulelal Jayanti 2026 : नए साल की ऐसी शुरुआत, जहां जल, ज्योति और आस्था मिलकर बनाते हैं एक अनोखा उत्सव </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8405</link><description>Jhulelal Jayanti 2026 : सिंधी समुदाय का प्रमुख पर्व चेटीचंड इस वर्ष 20 मार्च को मनाया जाएगा. यह दिन सिंधी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है. जिसे जल के देवता भगवान झूलेलाल की जयंती के रूप में मनाया जाता है. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला यह पर्व चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन आता है. सिंधी भाषा में चेट का अर्थ चैत्र और चंड का अर्थ चंद्रमा होता है. इसलिए इसे चैत्र का चांद भी कहा जाता है.




इस खास अवसर पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:51 से रात 8:12 बजे तक रहेगा. इस दौरान श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर मनोकामना पूरी करने के लिए आशीर्वाद लेते हैं. चेटीचंड केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सिंधी संस्कृति और एकता का प्रतीक भी है.


बेहराना साहिब का होता है खास महत्व
चेटीचंड पर सिंधी समाज में विशेष उत्साह देखने को मिलता है. लोग बेहराना साहिब तैयार करते हैं, जिसमें दीपक, मिश्री, फल, इलायची और सूखे मेवे रखे जाते हैं. इसके साथ झूलेलाल की प्रतिमा सजाकर नदी या जल स्रोत तक शोभायात्रा निकाली जाती है. वहां पूजा-अर्चना के बाद बेहराना साहिब का विसर्जन किया जाता है और प्रसाद वितरित किया जाता है.


ज्योति जागरण की परंपरा
इस दिन ज्योति जागरण की परंपरा भी निभाई जाती है. जिसमें आटे के दीपक में पांच बत्तियां जलाकर आराधना की जाती है. कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं और चालिहो के तहत लगातार प्रार्थना का संकल्प लेते हैं.</description><guid>8405</guid><pubDate>20-Mar-2026 10:33:35 am</pubDate></item><item><title>Chaitra Navratri 2026 : दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करने का नहीं मिल रहा समय, तो ये मंत्र भी देता है उतना ही फल </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8404</link><description>Chaitra Navratri 2026 : चैत्र नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ अत्यंत फल दायी माना जाता है, लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के लिए इसका संपूर्ण पाठ करना संभव नहीं हो पाता. ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शास्त्रों में इसके सरल विकल्प भी बताए गए हैं. जिनसे समान फल की प्राप्ति संभव मानी गई है.




लेकिन उससे पहले यह भी जान ले की दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करने से क्या फायदा या फल मिलता है. नवरात्रि के इन नौ दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष रूप से फल दायी माना जाता है. यह पवित्र ग्रंथ मां दुर्गा की शक्ति, करुणा और दैवीय लीलाओं का वर्णन करता है तथा इसमें 13 अध्यायों के माध्यम से देवी की महिषासुर पर विजय की गाथा बताई गई है. मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से जीवन के कष्ट, भय और बाधाएं दूर होती हैं. साधक को मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है. यही कारण है कि नवरात्रि में नवचंडी, शतचंडी और सहस्त्र चंडी जैसे यज्ञों का आयोजन भी किया जाता है.


कम समय में भी मिलेगा समान फल
यदि आपके पास समय की कमी है, तो आप पूरे पाठ के बजाय केवल रात्रि सूक्त (पहला अध्याय) और देवी सूक्त (पांचवां अध्याय) का पाठ कर सकते हैं. इसे भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है और इससे माता की कृपा प्राप्त होती है.


मंत्र जप से मिलेगा पूरा लाभ
अगर यह भी संभव न हो, तो सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय है. इस बीज मंत्र का 108 या 1008 बार जप करने से सप्तशती पाठ के समान फल प्राप्त होने की मान्यता है.


ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इसके अलावा


या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
का नियमित जप भी जीवन से भय और बाधाओं को दूर करता है और यदि आप और भी सरल उपाय चाहते हैं, तो जय माता दी या दुर्गा दुर्गा का भावपूर्वक स्मरण भी उतना ही फलदायी माना गया है.</description><guid>8404</guid><pubDate>20-Mar-2026 10:31:15 am</pubDate></item><item><title>Chaitra Navratri 2026: महाकाल वन क्षेत्र में हरसिद्धि का प्राचीन मंदिर, यहां गिरी थी माता सती की कोहनी, जानें कैसे मिली हरसिद्धि से प्रसिद्धि</title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8403</link><description>उज्जैन। सप्तपुरियों में एक अतिप्राचिन धर्म नगरी उज्जैन में स्थित मां हरसिद्धि मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। जहां देवी सती की कोहनी गिरी थी। महाकाल वन क्षेत्र में रुद्रसागर के किनारे स्थित यह मंदिर राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी को समर्पित है और यहां 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तंभ मुख्य आकर्षण हैं। जहां प्रतिदिन संध्या के समय दीप-मालिकाएं प्रज्वलित की जाती है। यह स्थान तंत्र साधना और महालक्ष्मी-महासरस्वती के संयुक्त रूप के लिए प्रसिद्ध है।


11 बार कटवाया था सिर
सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे। उन्होंने यहा 11 बार अपना शीश काटा था, जो माता की कृपा से पुनः जुड़ गया। लेकिन जब 12वीं बार उनका सिर नहीं जुड़ा तो माना गया उनका शासन सम्पूर्ण हो गया। यूं तो देशभर में हरसिद्धि देवी के कई प्रसिद्ध मंदिर है लेकिन वाराणसी और उज्जैन स्थित हरसिद्धि मंदिर सबसे प्राचीन है। कहा जाता है कि यह स्थान सम्राट विक्रमादित्य की तपोभूमि है। मंदिर के पीछे एक कोने में कुछ सिर सिन्दूर चढ़े हुए रखे हैं। ये विक्रमादित्य के सिर बताए जाते हैं।




परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी
ऐसा माना जाता है कि महान सम्राट विक्रमदित्य ने देवी हरसिद्धि को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक 12वें वर्ष में अपने हाथों से अपने मस्तक की बलि दी थी। उन्होंने ऐसा 11 बार किया लेकिन हर बार उनका सिर वापस आ जाता था। 12वीं बार सिर नहीं आया तो समझा गया कि उनका शासन संपूर्ण हो गया। हालांकि उन्होंने 135 वर्षो तक शासन किया था। माता हरसिद्धि को परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी भी बताया जाता है।


यहां गिरी थी हाथ की कोहनी
कीवदंति के अनुसार, उज्जैन की रक्षा के लिए आस-पास देवियों का पहरा है, उनमें से एक हरसिद्धि देवी भी हैं। कहते हैं कि यह मंदिर वहां स्थित है जहां सती के शरीर का अंश अर्थात हाथ की कोहनी आकर गिरी थी। अत: इस स्थल को भी शक्तिपीठ के अंतर्गत माना जाता है। इस देवी मंदिर का पुराणों में भी वर्णन मिलता है। कहते हैं कि चण्ड और मुण्ड नामक दो दैत्यों ने अपना आतंक मचा रखा था। एक बार दोनों ने कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई और वे दोनों वहां पहुंचे। दोनों जबरन अंदर प्रवेश करने लगे, तभी द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोका दिया।




दैत्यों का वध
दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया। शिवजी को जब यह पता चला तो उन्होंने तुरंत चंडीदेवी का स्मरण किया। देवी ने आज्ञा पाकर तत्क्षण दोनों दैत्यों का वध कर दिया। फिर उन्होंने शंकरजी के निकट आकर विनम्रता से वध का वृतांत सुनाया। इसके बाद शंकरजी ने खुश होकर कहा कि हे चण्डी, आपने दुष्टों का वध किया है इसलिए आपका नाम हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होगा।


51 शक्तिपीठों में से एक
उज्जैन स्थित माता हरसिद्धि शक्तिपीठ में माता सती के दाहिने हाथ की कोहनी गिरी थी। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होने के बाद देवी सती की दाहिनी कोहनी यहां शिप्रा नदी के तट पर गिरी थी, जिसके बाद यह 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ बनी।
</description><guid>8403</guid><pubDate>20-Mar-2026 10:28:03 am</pubDate></item><item><title>तीन हिंदू पर्वों का संगम आज : गुड़ी पड़वा, नवरात्रि और उगादी से होगी हिंदू नए साल की शुरुआत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8398</link><description>चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को उत्तर भारत में जहां भारतीय नववर्ष मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इस दिन उगादी का त्योहार मनाया जाता है. यह पर्व आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में विशेष रूप से मनाया जाता है. इसी दिन चैत्र नवरात्रि और मराठियों का नववर्ष गुड़ी पड़वा का भी शुभारंभ होगा.




चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला उगाही उत्सव प्रकृति के श्रृंगार और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है. इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी. इसे युगादि कहा जाता है, जिसका अर्थ है युग की शुरुआत. मान्यता है कि इसी दिन से समय की गणना शुरू हुई थी.


शुभ मुहूर्त
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से शुरू होकर 20 मार्च को शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के आधार पर यह पर्व 19 मार्च को ही मनाया जाएगा. नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना का विशेष महत्व होता है. घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 52 मिनट से 8 बजकर 8 मिनट तक रहेगा, जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 22 मिनट से 1 बजकर 11 मिनट तक रहेगा.


गुड़ी बांधने का शुभ मुहूर्त
गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र में हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है. इस दिन गुड़ी बांधने और ध्वज फहराने का समय सुबह 5 बजकर 15 मिनट से 7 बजकर 57 मिनट तक रहेगा. लोग घरों को सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं और विभिन्न पकवान तैयार करते हैं. यह दिन नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.</description><guid>8398</guid><pubDate>19-Mar-2026 10:48:18 am</pubDate></item><item><title>Chaitra Navratri 2026 : इस बार पालकी में बैठकर आएंगी माता, हर वाहन देता है आने वाले समय की परिस्थितियों का संकेत </title><link>https://didinews.co.in//culture.php?articleid=8396</link><description>Chaitra Navratri 2026 : चैत्र नवरात्रि 19 मार्च, गुरुवार से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाई जाएगी. नौ दिनों तक मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व रहेगा. इस बार नवरात्रि में देवी के आगमन की सवारी को लेकर कई तरह के संकेत बताए जा रहे हैं. मान्यता है कि मां दुर्गा हर वर्ष अलग-अलग वाहन से पृथ्वी पर आती हैं और उनका यह वाहन आने वाले समय की परिस्थितियों का संकेत देता है. इस बार गुरुवार से नवरात्रि की शुरुआत होने के कारण देवी का आगमन पालकी पर माना गया है. जिसे शास्त्रों में शुभ नहीं माना गया है.




देवीपुराण के अनुसार, पालकी पर आगमन होने से रोग, प्राकृतिक असंतुलन और सामाजिक अस्थिरता जैसी स्थितियां बन सकती हैं. वहीं इस वर्ष देवी का प्रस्थान हाथी पर बताया गया है, जिसे शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. ऐसे में यह नवरात्रि मिश्रित फल देने वाली मानी जा रही है.


घटस्थापना का मुहूर्त
प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को 6:53 बजे से शुरू होकर 20 मार्च को 4:52 बजे समाप्त होगी. घटस्थापना के लिए सुबह 6:50 से 7:20, अभिजीत मुहूर्त 12:20 से 1:20 और लाभ-अमृत बेला 12:50 से 03:50 तक शुभ समय है.


मां दुर्गा के पांच वाहन
पालकी  शास्त्रों में पालकी पर आगमन को अशुभ माना गया है, यह महामारी, रोग और सामाजिक अस्थिरता का संकेत देता है, साथ ही आपसी सहयोग की आवश्यकता को दर्शाता है.
हाथी  यह शांति, समृद्धि और सुख-शांति का प्रतीक है, इस पर प्रस्थान शुभ परिणाम देने वाला माना जाता है.
नाव  नाव जल और जीवन दोनों से जुड़ी है, यह बाढ़ के साथ अच्छी फसल और इच्छाओं की पूर्ति का संकेत देती है.
घोड़ा  घोड़ा विनाश, आंधी-तूफान, संघर्ष और उथल-पुथल का प्रतीक माना जाता है.
सिंह  मां दुर्गा का मुख्य वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार सप्ताह के दिन के आधार पर ही देवी के आगमन और प्रस्थान का वाहन तय होता है.</description><guid>8396</guid><pubDate>19-Mar-2026 10:44:36 am</pubDate></item></channel></rss>