विशेष सम्पादकीय: भयमुक्त बस्तर के विकास से होगा भारत का पुनर्जागरण
रायपुर |
21-May-2026
“देश अब नक्सलमुक्त हो चुका है” गृहमंत्री का यह बयान उन हजारों शहीद जवानों और संघर्षरत आदिवासियों के लिए सम्मान था, जो वर्षों नक्सलवाद से जूझते रहे थे। नक्सलवाद पर मिली यह सफलता संगठित प्रशासनिक प्रयास का परिणाम था। मगर इस घोषणा के साथ ही एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या नक्सलवाद का अंत ही अंतिम लक्ष्य है, या यह एक नई शुरुआत का संकेत भी है?
बस्तर की धरती ने नक्सलवाद के रूप में जो भी पीड़ा झेली है, वह अख़बारों में छपे सभी आंकड़ों से परे है। नक्सलवाद के साथ जुड़ी है टूटे हुए हज़ारों परिवारों की कहानी जिनके सपने हिंसा की भेंट चढ़ गए। बस्तर में माओवाद से याद आएगा किताब की जगह बंदूक थामने वाले बच्चों का बचपन और उन गांवों की चुप्पी जहां मौत का सन्नाटा हुआ करता था और वो घड़ी जब विकास का नाम लेना भी जान को जोखिम में डालने जैसा था।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आत्मसमर्पित नक्सलियों की बात करते हुए जिस छुपी हुई सच्चाई पर प्रकाश डाला वह भी बेहद मार्मिक था। उन्होंने कहा कि इन्हें बचपन में ही स्कूल से उठाकर हिंसा के रास्ते पर डाल दिया गया था, इसलिए मानवीय आधार पर इनका पुनर्वास केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी मुद्दा है।
सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाना भी केंद्रीय मंत्री के दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू था। जिन जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इस क्षेत्र को हिंसा से मुक्त करने का प्रयास किया उनका उचित सम्मान भी इस प्रशासनिक यात्रा का हिस्सा था। क्योंकि डीआरजी, कोबरा बटालियन और अन्य सुरक्षा बलों की भूमिका के बिना इस विराट सफलता की कल्पना नही की जा सकती थी। साहस और बलिदान के बूते मिली यह एक रणनीतिकि जीत है। इन सबके बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण था स्थानीय लोगों का बदलता विश्वास। नेतानार की उस महिला का यह कथन इस पूरे परिवर्तन का सबसे सशक्त प्रमाण है जिसमें उन्होंने कहा था कि “अब डर खत्म हो चुका है”।वास्तविकता में शांति तभी स्थापित होती है जब आम नागरिक खुली हवा में सांस ले सकें।
नक्सलवाद की जड़ें जहां गरीबी, बेरोजगारी और उपेक्षा में दबी हुई थी वहीं उसका समाधान विकास में निहित था। इतिहास गवाह है कि केवल बंदूक से विचारधारा का अंत नहीं किया जा सकता।केंद्रीय मंत्री ने भी यही कहा कि “विकसित बस्तर के बिना विकसित भारत संभव नहीं” उनका यह कथन एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
नेतानार में सुरक्षा कैंप को जनसुविधा केंद्र में बदलना एक बड़े सकारात्मक सोच का प्रतीक है। जहां कभी सुरक्षा बलों की चौकसी हुआ करती थी वहां अब आम जनता के लिए सेवाएं उपलब्ध होंगी यह एक बड़ा भौतिक और मानसिक बदलाव देखा गया। इस महाविजय के साथ ही वह दूरी भी खत्म हो रही है जो वर्षों से प्रशासन और जनता के बीच बनी हुई थी।
इस वक्त सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसे तीन स्तम्भों पर आधारित है बस्तर का विकास। जिन संरचनाओं को कभी नक्सली अपना निशाना बनाया करते थे आज वही क्षेत्र विकास की रफ्तार में आगे दिखाई दे रहे हैं। इस दौरे में केंद्रीय मंत्री अमित शाह का स्थानीय इमली का स्वाद चखना और स्व-सहायता समूह की महिलाओं से संवाद करना भी एक भावनात्मक और अपनेपन से भरा पल था। इस प्रतीकात्मक घटना से उस सत्य का पता लगता है कि सरकार अब बस्तर को केवल सुरक्षा के नजरिए से नहीं बल्कि एक जीवंत समाज के रूप में देख रही है।
बस्तर की महिलाएं इमली प्रसंस्करण के माध्यम से सालाना आय अर्जित कर रही हैं, जो आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को जमीनी स्तर पर साकार करने वाला है।ऐसे बदलाव बंदूक से नहीं बल्कि अवसरों से आते हैं।
हालांकि, आज बस्तर की समग्र तस्वीर सकारात्मक है, मगर फिर भी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। नक्सलवाद की विचारधारा पूरी तरह समाप्त हुई है या नहीं यह भी आने वाला समय ही बताएगा। फ़िलहाल समग्र प्रयास यही होनी चाहिए कि विकास की प्रक्रिया में निरंतरता बनी रहे, स्थानीय संस्कृति और पहचान को संरक्षित रखी जाए, युवाओं को सही मार्गदर्शन और दिशा देकर यह सुनिश्चित क़रें कि विकास केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे बल्कि हर व्यक्ति के जीवन में वास्तविक सुधार हो ।
एक बड़े संघर्ष के बाद बस्तर आज जिस मोड़ पर खड़ा है वह केवल एक क्षेत्र का बदलाव नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक प्रेरणा भी है।भयमुक्त बस्तर आज इस बात की खुली घोषणा है कि जब सुरक्षा, विकास और संवेदनशीलता का संतुलन बनता है तब ही असंभव, संभव बन पाता है। देश के गृहमंत्री का यह दौरा एक संदेश भी था कि भारत अब केवल समस्याओं से लड़ने वाला देश नहीं रहा बल्कि समाधान गढ़ने वाला राष्ट्र बन चुका है। नकसल मुक्त बस्तर के सफलता की यह कथा भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव भी बन सकती है।
छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 19 मई को जगदलपुर में मध्य क्षेत्रीय परिषद की 26वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए बस्तर को राष्ट्रीय विकास विमर्श के केंद्र में लाने का काम किया । इस उच्च स्तरीय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित 4 राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए थे। नक्सलवाद के बाद बदलते बस्तर को केंद्र में रखते हुए सुरक्षा समन्वय, साइबर सुरक्षा, प्रशासनिक तालमेल और आधारभूत विकास, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं पर गहन चर्चा हुई। मध्य क्षेत्रीय परिषद की 26वीं बैठक बस्तर के लिए नई संभावनाओं और समग्र विकास के संकल्प का प्रतीक बनकर उभरी है।
इन सब के बाद भी असली परीक्षा इस सुखद बदलाव को स्थायी बनाने की है। उम्मीद यही की जा रही है कि इस क्षेत्र में बंदूक की खामोशी के बाद विकास, विश्वास और मानवता की आवाज ही गूंजने वाली है।