संस्कृति

होली के बाद शुरू होगी गणगौर की अनोखी परंपरा, जानें पूरी रस्म और महत्व

 गणगौर का पर्व विशेष महत्व रखता है। यह पर्व पूरे 16 दिन तक मनाया जाता है, जिसमें कुंवारी लड़कियां, नवविवाहिता और महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की ईसर और गणगौर के रूप में पूजा करती हैं। प्रतिदिन नवविवाहिताएं और युवतियां एकत्रित होकर कुओं से दूब लेकर आती हैं, उसी से गणगौर का पूजन करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत रखने वाली महिलाओं को शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।


4 मार्च से होगी पूजा शुरू
परंपरा में गणगौर सुहाग, श्रद्धा और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। 4 मार्च से ईसर-गणगौर पूजन का शुभारंभ होगा। महिलाएं भाग्य और सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं।

16 दिनों तक रखा जाएगा व्रत
गणगौर पर्व की विशेषता 16 दिवसीय साधना और सोलह श्रृंगार में है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 16 दिनों तक तपस्या की थी। इसी कारण यह पर्व 16 दिनों तक मनाया जाता है। पूजा में 16 प्रकार की सामग्री, 16 बार काजल, रोली या मेहंदी से बिंदियां, 16 व्यंजनों का भोग और सोलह श्रृंगार किया जाता है।

परंपरा का हिस्सा
होली के दूसरे दिन से 8 दिन कच्ची और फिर 8 दिन पक्की गणगौर की पूजा होती है। शीतलाष्टमी पर कुम्हार के घर से मिट्टी लाकर गणगौर और ईसर की मूर्ति बनाई जाती है, और उनका श्रृंगार किया जाता है। यह पर्व राजस्थान की संस्कृति को दर्शाता है। इस पर्व को देशभर में राजस्थानी समाज के लोग मानते हैं।

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