छत्तीसगढ़ / रायपुर

"पद्मश्री डॉ. एस.आर. रंगनाथन के 131वें जन्मदिन पर 'लाइब्रेरियन दिवस' का आयोजन"


रायपुर: भारत में लाइब्रेरी साइंस के जन्मदाता पद्मश्री डॉ. एस.आर. रंगनाथन का 131वां जन्मदिन ‘लाइब्रेरियन डे’ के रूप में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के पं. सुंदरलाल शर्मा ग्रंथागार तथा पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में मनाया गया। इस अवसर पर रंगनाथन स्मृति व्याख्यान एवं भाषण प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अंचल के प्रख्यात साहित्यकार श्री गिरीश पंकज शामिल हुए।

कार्यक्रम का शुभारंभ माता सरस्वती एवं पद्मश्री डॉ. एस.आर. रंगनाथन की तस्वीर पर माल्याअर्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। अपने आतिथ्य संबोधन में मुख्य वक्ता श्री गिरीश पंकज ने कहा कि वर्तमान में स्थान केन्द्रित पुस्तकालयों का कॉन्सेप्ट नहीं हैै, हम सभी डिजिटल माध्यम में परिवर्तित हो रहे हैं। जिसमें हमारी किताबों का केवल स्वरूप बदला है लेकिन किताबें वही हैं। हमें केवल उन तक पहंुचना है। आज के वर्ग को डिजिटल युग में रहते हुए भी किताबों को हाथ में लेकर पढ़ने की आदत डालने की जरूरत है। क्योंकि डिजिटल दुनियां बिजली पर टिकी है और एक बार बिजली धोखा दे सकती है लेकिन किताबें नहीं।



आगे उन्होंने बताया कि डॉ. रंगनाथन उस शख्स का नाम है जो शून्य से शिखर तक गए। इसी तरह वर्तमान में भी पुस्तक संस्कृति से जुड़कर ही हम शिखर तक पहंुच सकते हैं। इसके लिए केवल पुस्तकों की उपयोगिता को महसूस करना है। हमारे आसपास पढ़ने को बहुत सारी किताबें हैं लेकिन उनमें से ऐसी किताबों का चयन करना है जो हमारे ज्ञान का विकास करें। देश में नागरिक बहुत हैं लेकिन बौद्धिक नागरिकों की कमी है।

उन्होंने भारत के नांलदा, तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों की समृद्ध पुस्तकालयों का भी जिक्र करते हुए बताया कि जीवन में पुस्तकालय ही ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले केन्द्र हैं इसलिए प्राचीन समय में इसे विरोध स्वरूप नष्ट किया गया था। उन्होंने अपने जीवन का जिक्र करते हुए बताया कि अगर पुस्तकालय न होते तो आज मैं भी यहां न होता, पुस्तकालय ने ही मुझे कुछ गढ़ा है इसलिए मैं इसका ऋणी हूं। वे कहते हैं आज भी जब कभी मुझे भ्रंम की स्थिति होती है तो मैं किताबों की ओर देखता हूं। अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने कहा कि जब हम किताबों को पढ़ेंगे तब ही उनकी परंपरा और साधना को जीवन में उतारने का अवसर मिलेगा।

कार्यक्रम में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुपर्ण सेन गुप्ता ने कहा कि हम हर साल डॉ. रंगनाथन जी की जंयती मनाते हैं, उनको याद करते हैं। इसके पीछे की वजह है कि हम उन दो घंटो में उन्हें जीने का प्रयास करते हैं, उनके आदर्शों को अपनाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने आगे बताया कि जब-जब हम इस तरह के किसी भी महापुरूषों को पढ़ते हैं तो कुछ नया जानने और सुनने को मिलता है।
कार्यक्रम को प्रो. माया वर्मा ने भी संबोधित करते हुए कहा कि डिजिटल क्रांति ने लोगों के हाथो से किताबें छिन ली है। पहले हम ट्रेन में सफर के दौरान किताब लेकर चलते थे लेकिन आज पूरा समय मोबाइल या लैपटॉप में बिता देते हैं। आशय यह है कि हमारे सामने माध्यम कोई भी हो लेकिन पढ़ने की प्रवृत्ति को कभी नहीं भूलना चाहिए।

‘लाइब्रेरियन डे’ कार्यक्रम में मंच संचालन डॉ. पूर्णीमा कुमारी, आभार प्रकट डॉ. हरीश साहू, ने किया। इस अवसर पर प्रो शैल शर्मा, प्रो मीता झा, विश्वविद्यालय के अन्य प्राध्यापकगढ़ एवं छात्र-छात्राओं के साथ अन्य कॉलेजों के लाइब्रेरियन डॉ प्रवीण शर्मा, डॉ सुनील साथपति, डॉ सुनील सोनी, इत्यादि भी उपस्थित रहे।

भाषण प्रतियोगिता में संदीप रहे प्रथम

‘लाइब्रेरियन डे’ के अवसर पर व्यक्तित्व विकास में ग्रंथालय की भूमिका, ग्रंथालय कल, आज और कल, मेरे सपनो का ग्रंथालय, डिजीटल युग में ग्रंथालय जैसे विषयों पर भाषण प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। जिसमें विश्वविद्यालय के अलग-अलग विभागों में अध्ययनरत 15 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। इस प्रतियोगिता में ग्रंथालय एवं सूचना विज्ञान अध्ययन शाला से एम.लिब. के छात्र संदीप कुमार प्रथम स्थान पर रहे। साथ ही मेहूल राव और प्रांशु पाण्डे ने द्वितीय तथा दिप्ती वर्मा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय प्रो सच्चिदानंद शुक्ला जी, कुलसचिव डॉ शैलेंद्र पटेल एवं उपस्थित गणमान्य आगंतुकों के प्रति आभार प्रदर्शन उपरांत राष्ट्र गीत के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
 



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