सामान्य ज्ञान

यहां शयन करते हैं शिव–पार्वती, रात में सजाते हैं चौपड़:ओंकारेश्वर भगवान शिव का प्राण, तो ममलेश्वर शरीर; दोनों के दर्शन पर ही पूरी होगी यात्रा

मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए श्रद्धालु देशभर से आते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं से पुजारी और दुकानदार ममलेश्वर महादेव मंदिर दर्शन के लिए जाने की बात भी कह रहे हैं। वे कहते हैं कि वहां नहीं गए, तो यात्रा अधूरी रह जाएगी। सवाल उठता है कि ममलेश्वर मंदिर के दर्शन नहीं किए, तो यात्रा अधूरी कैसे? क्या ओंकारेश्वर और ममलेश्वर मंदिर अलग-अलग हैं या दोनों का आपस में संबंध है? दोनों मंदिर मां नर्मदा के दो किनारों पर स्थित हैं। ममलेश्वर नर्मदा के दक्षिण तट पर ओंकारेश्वर से थोड़ी दूर स्थित है। मान्यता के अनुसार दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यानी अलग होते हुए भी इनकी गणना एक ही तरह से की जाती है। पुराणों में ओंकारेश्वर को भगवान शिव का 'प्राण' और ममलेश्वर को 'पिंड (शरीर)' कहा गया है। इसके बारे में जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ने ओंकारेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित और ममलेश्वर मंदिर के पूर्व पुजारी पंडित बसंत अत्रे से बात की। जानने की कोशिश की कि आखिर दोनों मंदिरों के बीच क्या संबंध है? पहले बात ओंकारेश्वर शिवलिंग की… भगवान राम के पूर्वजों से ओंकारेश्वर का संबंध देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग चतुर्थ यानी चौथे नंबर का है। वैसे तो मंदिर के बारे में प्रमाणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। फिर भी तीन मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली कथा: ओंकारेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित कहते हैं कि शास्त्रों में बताया गया है कि ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम भगवान राम की 15वीं पीढ़ी के पूर्वज राजा मान्धाता के नाम पर है। उन्होंने यहां नर्मदा नदी के इस पर्वत पर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया। शिवजी से राजा मान्धाता ने यहीं निवास करने का वरदान मांग लिया। तभी से तीर्थ नगरी ओंकार मान्धाता के रूप में पहचाने जाने लगी। यहां की एक साधना मान्धाता द्वीप की परिक्रमा मानी जाती है। जब साधक नर्मदा किनारे द्वीप के चारों ओर चलते समय ऊँ का जप करता है, तब हर कदम मानो किसी मंत्राक्षर पर पड़ने जैसा अनुभव देता है। यह परिक्रमा केवल व्रत या नियम नहीं, बल्कि जीवन को ईश्वर की ध्वनि के हवाले करने जैसी साधना बन जाती है। दूसरी कथा– पंडित डंकेश्वर दीक्षित कहते हैं कि एक बार नारद मुनि गिरिराज विंध्य पर्वत पर घूमते-घूमते पहुंच गए। विन्ध्याचल ने कहा कि उनके पास कोई कमी नहीं है। उनका अंहकार देखकर नारदजी ने विन्ध्याचल से कहा कि मेरू पर्वत के बराबर विन्ध्याचल की ऊंचाई नहीं है। उस पर्वत के शिखर इतने ऊंचे हो गए हैं कि वो देवताओं के लोकों तक पहुंचे चुके हैं। विंध्याचल इस शिखर तक नहीं पहुंच पाएगा। यह कहकर नारद जी चले गए। यह सुनकर राजा विंध्याचल को बहुत दु:ख हुआ। उन्होंने शिवजी की आराधना करने का फैसला किया। पार्थिव शिवलिंग वो कठोर तपस्या करने लगे। प्रसन्न होकर शिव जी ने कार्य सिद्ध करने वाली बुद्धि का वरदान दे दिया। उसी समय देवतागण और कुछ ऋषिगण भी पहुंच गए। इन सभी ने अनुरोध किया कि वहां स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो जाएं। इसके बाद ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में बंट गया, जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अन्य कथा– इसके अनुसार जब त्रिपुरासुर जैसे दैत्य के अत्याचार से देवता व्याकुल हुए। उन्होंने शिवजी से रक्षा की प्रार्थना की, तब शिवजी ने इसी क्षेत्र में तेजस्वी रूप धारण कर संतुलन स्थापित किया। दोनों ही कथाओं में मूल संदेश एक ही है कि जब भक्ति, नाद और प्रार्थना किसी पवित्र धरती पर मिलते हैं, तो दिव्यता स्वयं को प्रकट करने का मार्ग तलाश लेती है। ममलेश्वर मंदिर के बारे में भी दो मान्यताएं पहली – पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित बताते हैं कि भगवान ओंकारेश्वर स्वयंभू, प्रणव (ॐ) स्वरूप और मुख्य ज्योतिर्लिंग है। प्राचीन समय में जब नर्मदा में बाढ़ आती थी, तो श्रद्धालु ओंकारेश्वर मंदिर तक नहीं पहुंच पाते थे। ऐसे में आदि गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भगवान ममलेश्वर की स्थापना करवाई, ताकि वहां दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को भी समान धार्मिक फल प्राप्त हो। इसी कारण दोनों का महत्व एक समान माना जाता है और इसे "ॐकारम्-अमलेश्वर" भी कहा जाता है। दूसरी – वहीं, पिछली चार पीढ़ियों से ममलेश्वर मंदिर के पुजारी रह रहे अत्रे परिवार के सदस्य व पूर्व पुजारी पंडित बसंत अत्रे का कहना है कि शिवपुराण के अनुसार राजा विंध्य ने 60 हजार पार्थिव शिवलिंग बनाकर छह महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया, तब विंध्य द्वारा पार्थिव शिवलिंग में विराजित करवाया गया। यही स्वरूप आगे चलकर अमलेश्वर और वर्तमान में ममलेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ममलेश्वर का अर्थ मम यानी मेरा, लेश यानी दुःख ममलेश्वर मतलब मेरे दु:ख को हरने वाला। शयन आरती मानी जाती है खास… मंदिर के पुजारियों के अनुसार ओंकारेश्वर में शयन आरती का उतना ही महत्व है, जितना कि उज्जैन के महाकाल में भस्म आरती का। ओंकारेश्वर में तीन पुरियां हैं, शिवपुरी, विष्णुपुरी और ब्रह्मपुरी। इस कारण ही यहां तीन प्रहर की आरती का नियम है। इनमें शयन आरती खास मानी जाती है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान शंकर यहां मौजूद रहते हैं। मंदिर के पुजारी डंकेश्वर दीक्षित कहते हैं कि शयन आरती के पहले गर्भगृह में ज्योर्तिलिंग के सामने प्रतिदिन चौपड़ बिछाकर उसकी गोटियां और पासे रखे जाते हैं। आरती के बाद दरवाजे पर लगाए जाने वाले ताले की भी पूजा की जाती है। इस दौरान रात में किसी भी व्यक्ति को मंदिर में अंदर रहने की इजाजत नहीं है। दूसरे दिन ब्रम्हमुहु्र्त में मंदिर के जब पट खोले जाते हैं, तो चौपड़ पर रखी गोटियां और पासे इस प्रकार से बिखरे मिलते हैं, जैसे– उसे खेला गया हो। कहा जाता है कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ही एक मात्र ऐसा तीर्थ स्थल है, जहां हर रात भगवान शिव और माता पार्वती चौपड़ खेलते हैं। ये भी पढ़ें… महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा से मंदिर के इतिहास तक 12 ज्योतिर्लिंगों में भगवान महाकालेश्वर का विशेष स्थान है। उज्जैन का महाकाल मंदिर देश का प्रमुख शिवधाम है और यहां भगवान शिव दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उज्जैन में महाकाल की उत्पत्ति कैसे हुई? भगवान महाकाल ने उज्जैन को ही क्यों चुना? पढ़ें पूरी खबर…

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