छत्तीसगढ़ /

संसार ही समुद्र है और इसमें हमेशा कर्म का मंथन होता है- भरत महाराज

छत्तीसगढ़ संवाददाता दुर्ग, 25 नवंबर। किल्ला मंदिर तमेरपारा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में चित्रकूट से पधारे भरत महाराज ने समुद्र मंथन की सुंदर कथा सुनाई। उन्होंने कहा यह संसार ही समुद्र है और इसमें हमेशा कर्म का मंथन होता है करने वाले देवता और दैत्य प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। कर्म का मंथन करने पर सबसे पहले असफलता का विष प्राप्त होता है, लेकिन जो उसमें अडिग रहा तो अंत में उसकी सफलता का अमृत भी मिलता है, समुद्र से निकले हुई अनेक रत्न की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा सब कुछ संसार में उपलब्ध है, लक्ष्मी भी उसी को प्राप्त होती है जो उद्योग करता है अर्थात कर्मशील होता है भरत महाराज ने राजा बलि की कथा सुनाते हुए कहा की जीव को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए तभी भगवान उसके रक्षक यानी चौकीदार बनते हैं। भक्ति मय भजनों में झूमते हुए श्रोताओं को उन्होंने कृष्ण जन्म की बड़ी ही सारस और मार्मिक कथा सुनाई। कथा के अंत में हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल के नारों से पूरा पांडाल गूंज उठा। सभी लोगों ने उल्लास के साथ नाचते गाते हुए कृष्ण जन्म का आनंद लिया।

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