उत्तराखंड की पावन धरती इस समय आस्था के रंग में रंगी हुई है. इन दिनों चार धाम यात्रा पूरे शबाब पर है. इसी बीच एक ऐसा सिद्धपीठ भी श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. जिसे ऋषियों की तपोभूमि और मां काली की प्रकट स्थली माना जाता है. नैनीताल जिले के काठगोदाम के पास स्थित कालीचौड़ धाम प्राचीन मंदिर देवी काली को समर्पित है. मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, सत्ययुग में सप्तऋषियों ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भगवती की आराधना की थी. दिव्य सिद्धियां प्राप्त की थी. यही वजह है कि कालीचौड़ धाम को एक शक्तिशाली सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है.
कोलकाता के भक्त को दिए थे दर्शन
मंदिर की स्थापना को लेकर भी कई अद्भुत कथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि कलकत्ता के एक भक्त को स्वप्न में मां काली ने इस स्थान के दर्शन कराए थे. इसके बाद वह हल्द्वानी पहुंचा. अपने मित्र के साथ मिलकर इस दिव्य स्थल की खोज की, खोज के दौरान जमीन से मां काली सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रकट हुई. जिसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया.
आदि गुरु शंकराचार्य ने साधना की थी
आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखंड आगमन के दौरान यहां आकर साधना की थी. वहीं, आधुनिक संत पायलट बाबा ने भी इसी स्थान से आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त की थी.
कैसे पहुंचे
चार धाम यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए कालीचौड़ धाम एक विशेष आकर्षण है. यह स्थल हरिद्वार से लगभग 280 किलोमीटर और ऋषिकेश से करीब 260 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. खास बात यह है कि यह धाम केदारनाथ और बद्रीनाथ मार्ग के अपेक्षाकृत निकट पड़ता है. जिससे श्रद्धालु अपनी यात्रा के दौरान यहां आसानी से आ-जा सकते हैं.
यात्रा पूर्ण मानी जाती
कहा जाता है कि यदि कोई भक्त चार धाम यात्रा के साथ कालीचौड़ धाम के दर्शन भी करता है, तो उसे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है. उसकी यात्रा पूर्ण मानी जाती है. हालांकि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता जंगलों से होकर गुजरता है. जिससे यह यात्रा थोड़ी कठिन जरूर है, लेकिन आस्था के आगे हर कठिनाई छोटी पड़ जाती है.