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अमेरिका पर भड़का भारतः रूसी तेल खरीद पर बार-बार निर्देश देने पर कहा- ‘तुम कौन होते हो हमें आदेश देने वाले, इंडिया खुद तय करेगा कि…’

 रूस से तेल खरीदने को लेकर एक बार फिर भारत और अमेरिका के रिश्ते में मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। रूसी तेल खरीद पर अमेरिका द्वारा बार-बार दिशा निर्देश देने से भारत नाराज हो गया है। अमेरिका को दो टूक जवाब देते हुए भारत ने कहा कि तुम कौन होते हो हमें आदेश देने वाले। इंडिया खुद तय करेगा कि उससे कहां से और कितनी मात्रा में तेल खरीदना है।


भारत ने अमेरिका से कहा कि देश की ऊर्जा नीति का निर्णय नई दिल्ली में होगा, वॉशिंगटन में नहीं। ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ही भारत अपने तेल आयात से जुड़े फैसले लेता रहेगा। भारत ने एक बार फिर संकेत दिया है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता करने के पक्ष में नहीं है।


दरअसल रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर मेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio On Russian Oil) ने भारत सहित उन देशों को दी गई छूट और विशेष व्यवस्थाओं को जल्द समाप्त करने की बात कही है। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति की सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन उन सभी विशेष व्यवस्थाओं और प्रतिबंधों में दी गई छूट को जल्द खत्म करना चाहता है। इसकी वजह से भारत जैसे देश रूस से तेल आयात कर पा रहे हैं। रुबियो का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की ऊर्जा नीति को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों का रुख कई बार बदलता रहा है। इससे एक बार फिर भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ सकता है।


रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदलता रहा पश्चिमी देशों का रुख

बता दें कि फरवरी 2022 में रूस की ओर से यूक्रेन पर हमला शुरू करने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इस दौरान पश्चिमी देशों ने एक ओर भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने की आलोचना की। वहीं दूसरी ओर कई मौकों पर इसे स्वीकार भी किया।


भारत ने दोहराया रणनीतिक स्वायत्तता का सिद्धांत

भारत का कहना है कि वह 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला एक संप्रभु राष्ट्र है, जिसकी ऊर्जा जरूरतें बेहद बड़ी हैं। ऐसे में सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा उपलब्ध कराना उसकी आर्थिक और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का हिस्सा है। भारत का स्पष्ट मत है कि किसी भी विदेशी शक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को कैसे और कहां से पूरा करे।


चीन का मुद्दा भी बना चर्चा का विषय

इस बहस में चीन का मुद्दा भी बार-बार उठाया जा रहा है। भारत के कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन आज भी रूसी ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। उसके खिलाफ अमेरिका अपेक्षाकृत अधिक सावधानी बरतता दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की वैश्विक आर्थिक ताकत और कई महत्वपूर्ण संसाधनों पर उसकी पकड़ के कारण अमेरिका उसके खिलाफ कठोर कदम उठाने से बचता है। ऐसे में भारत में यह धारणा बन रही है कि नियम और दबाव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किए जाते, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक हितों के अनुसार बदले जाते हैं।

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