कहा जाता है कि कोई भी काम खुशी-खुशी करना ज्यादा अच्छा होता है, नहीं तो वही काम जब मजबूरी में करना पड़ता है, बहुत बुरा लगता है।जब कोई भी काम आदमी खुशी-खुशी करता है तो वह खुद भी खुश रहता है और दूसरे लोग भी खुश रहते हैं कि हमारा बेटा हमारे लिए इतना कुछ खुशी खुशी कर रहा है, वही काम बेटा खुशी की जगह संपत्ति के लालच में करता है और माता-पिता को पता चलता है कि हमारा बेटा हमारी सेवा को अपना कर्तव्य नहीं समझता है तो उनको बुरा लगता है कि जिसकों हमने पाल पोस कर इतना बड़ा किया वह हमको बोझ समझता है। माता पिता अपनी संतान को बोझ नहीं समझते हैं लेकिन जब वही बच्चा ब़ड़ा होकर माता पिता को बोझ समझता है, उनसे ज्यादा महत्व संपत्ति को देता है तो माता पिता को बुरा लगता है। लेकिन जब बेटा माता-पिता की संपत्ति लेकर भी माता-पिता की सेवा नहीं करता है तो उनको बहुत ज्यादा बुरा लगता है। ऐसे में माता पिता के सामने अपने बेटे को सजा देने के अलावा कोई चारा नहीं रहता है।
अब माता पिता अपने नालायक बेटों को उसी तरह सजा दे सकते हैं जैसे छतरपुर की एक मां ने अपने नालायक बेटे को सजा दी है।उनको सावधानी यह रखनी है कि वह अपनी संपत्ति अपने बेटे या बेटों को देते हैं तो गिफ्ट डीड कराके दें और बेटे से वचनपत्र भी लें कि यदि वह उनकी देखभाल नहीं करेगा तो संपत्ति उससे वापस ले ली जाएगी। देखभाल न करने या उपेक्षा करने पर बुजुर्ग माता पिता बच्चों को उपहार में दी गई संपत्ति की गिफ्ट डीड रद्द करा सकते है,उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल करा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में मां की याचिका पर बेटे को उपहार में दी गई संपत्ति की गिफ्ट डीड रद्द कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड रद्द करते हुए २८ फरवरी तक मां को संपत्ति का कब्जा देने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा है कि सीनियर सिटीजन एक्ट २००७ एक लाभकारी कानून है।इस कानून के तहत ट्रिब्यूनल वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए जरूरी होने पर बेदखली का आदेश दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने २ जनवरी को दिए फैसले में वरिष्ठ नागरिक कानून धारा २३ की व्याख्या करते हुए कहा कि इस धारा के तहत वरिष्ठ नागरिक को उपलब्ध राहत का कानून के उद्देश्य और कारण से संबंध है।कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में हमारे देश के बुजुर्गों की देखभाल नहीं होती है। ऐसे में ये चीजें सीधे तौर पर कानून के उद्देश्य से जुड़ी हुई हैं। पीठ ने कहा कि अगर वरिष्ठ नागरिक देखभाल करने की शर्त पर ,संपत्ति अपने बेटे को देते हैं तो यह कानून उन्हें अधिकारों का संरक्षण करने की शक्ति देता है।
मप्र के छतरपुर की मां ने याचिका दाखिल कर बेटे पर देखभाल न करने व उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए उसे उपहार में दी गई संपत्ति की गिफ्ट डीड रद्द करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मां की याचिका पर गिफ्ट डीड रद्द कर दी है और संपत्ति मां को वापस सौंपने का आदेश दिया है।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन माता पिता के लिए बड़ी राहत की बात है जिन्होंने अपन बच्चों को संपत्ति दी है लेकिन वह उनकी देखभाल नहीं करते हैं। अब इससे होगा यह माता-पिता भी सजग हो जाएंगे और यूं ही बच्चों के संपत्ति नहीं सौंप देंगे। इसके लिए वह गिफ्ट डीड बनवाकर बच्चों को संपत्ति सौंपेंगे ताकि वह उनकी देखभाल न कर सकें तो उनसे वह संपत्ति वापस ली जा सके। जो उनको देखभाल करने की शर्त पर ही दी गई थी।
पहले होता यह था कि माता-पिता बिना गिफ्ट डीड बनाए ही बच्चों को संपत्ति सौंप देते थे तो बच्चे संपत्ति लेने के बाद माता-पिता की सेवा नहीं करते थे और माता-पिता उनसे संपत्ति वापस भी नहीं ले पाते थे । माता पिता तो चाहते हैं कि उनका बेटा उनकी देखभाल खुशी खुशी करे, इसलिए वह अपनी संपत्ति उनको बिना कोई कानूनी औपचारिकता पूरी किए दे देते थे लेकिन कुछ बेटों की गलती के कारण अब माता पिता को मजबूरी में गिफ्ट डीड कर संपत्ति बेटों को देंगे और अब बेटों को गिफ्ट डीड के कारण खुशी खुशी नहीं तो संपत्ति के कारण माता पिता की देखभाल तो करनी ही पड़ेगी।