छत्तीसगढ़ /

1300 साल पुराना है नवागढ़ का शमी गणेश मंदिर

अष्टकोणीय स्थापत्य और प्राचीन शमी वृक्ष मंदिर की पहचान गणेश चतुर्थी विशेष छत्तीसगढ़ संवाददाता बेमेतरा, 14 सितंबर। बेमेतरा जिले के नवागढ़ में स्थित सिद्धि श्रीगणेश मंदिर आस्था के तथा छत्तीसगढ़ की प्राचीन स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। साल भर यहां देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना गणेश जी पूरी करते हैं। सामने स्थित प्राचीन समी वृक्ष के कारण इसे भी श्री शमीगणेश मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्र में माता महामाया का प्राचीन मंदिर, बगीचे, तालाब, बावली और अनेक मंदिरों के अवशेष उस काल की समृद्धि व्यवस्था को दर्शाते हैं। छत्तीसगढ़ के कलचुरि शासन को स्वर्णकाल माना जाता है। उनकी राजधानी क्रमश: तुम्मान, रतनपुर, खल्लारी और रईपुर रही। इतिहासकार डॉ. दीवान बताते हैं कि जब राजधानी रतनपुर थी तब प्रशासनिक कार्य वहीं से होते थे, जबकि सैन्य छावनी शिवनाथ नदी के दक्षिण में लगभग अठारह किलोमीटर दूर मांडव या मारों में थी, ताकि विशाल भू-भाग में सैन्य पहुंच सुगम हो सके। गोंड़ राजाओं के काल में निर्माण इतिहासकार डॉ. वसुबन्धु दीवान के अनुसार नवागढ़ का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण है। उनके शोध के मुताबिक मंदिर का निर्माण संभवत: संवत 704 यानी करीब 674 ईस्वी में गोड़ राजाओं के काल में हुआ था। मंदिर के सामने स्थित शमी वृक्ष को भी उसी काल का माना जाता है। इसका उल्लेख गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका में मिलने की बात कही जाती है। अष्टकोणी मंदिर और प्राचीन कुआं श्री खेड़ापति जी का यह प्राचीन मंदिर उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली में निर्मित है। इसकी सबसे खास विशेषता इसकी अष्टकोणीय संरचना है। मंदिर परिसर में ईंटों से बारीकी से निर्मित अष्टकोणीय कुएं भी मौजूद है। यहां एक प्राचीन शिलालेख मिलने की जानकारी है जिसके प्राकृत लिपि में होने की संभावना बताई गई है। डॉक्टर दीवान के अनुसार कल्चुरी काल में नवागढ़ 85 गांव वाले एक परगने का प्रमुख केंद्र था। यहां मिट्टी से निर्मित किले के अवशेष आज भी मौजूद हैं। माता महामाया का प्राचीन मंदिर, तालाब, बावली बगीचे और अन्य मंदिरों के अवशेष क्षेत्र के तत्कालिक समृद्धि की कहानी कहते हैं। मराठा काल में जीर्णोद्धार मंदिर का समय-समय पर कई बार जीर्णोद्धार हुआ। 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले के आदेश पर मंदिर के कुछ हिस्सों का जीर्णोद्धार कराया गया था। ब्रिटिश काल में पुरातत्वविद जेडी बलंट ने भी मंदिर का सर्वेक्षण कर इसकी महत्ता को रेखांकित किया था। छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से कुछ वर्ष पहले मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। आज यहां श्रद्धालुओं की आस्था और प्राचीन विरासत साथ-साथ दिखाई देती है। नवागढ़ के मंदिर और आसपास बिखरी प्राचीन मूर्तियों व स्थापत्य अवशेष क्षेत्र को पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हैं। इनके संरक्षण में व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत है।

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